कभी जो रिश्ता था
सांसों की तरह सहज,
आज वही शब्दों के लिबास में
कितना अजनबी लगता है।
तुमने कहा — "कैसे हैं आप?
"मैं ठिठक गया...आप?
वही तुम जो कभी बिन पूछे
मेरी चाय में दो चम्मच
चीनी डाल देते थे।
अब मिलते हैं तो मुस्कुराहट भी नापकर दी जाती है,
जैसे बाज़ार में तराज़ू पर रखा हो कोई पुराना एहसास।
बातें होती हैं पर भीतर तक नहीं उतरतीं,
शब्द आते हैं पर आत्मा छू नहीं पाते-
जैसे काँच के पार
कोई दीया जलता हो,
रोशनी दिखे पर ऊष्मा न मिले।कितनी अजीब है यह दूरी
जो पास रहकर भी बनती है,
औपचारिकता की चादर
रिश्तों को ओढ़ा कर
उन्हें जिंदा लाश बना देती है।
याद है मुझे —
जब खामोशी भी बातें करती थी,
जब एक नज़र में
सब कह दिया जाता था,
जब रोने के लिए
कोई कारण नहीं चाहिए था -
बस एक कंधा काफी था।
आज वही कंधा
औपचारिक हाथ मिलाने में बदल गया है।
मैं सोचता हूँ —
क्या रिश्ते भी थक जाते हैं?
या हम ही उन्हें थका देते हैं
अपने अहंकार से,
अपनी व्यस्तताओं से,
अपनी उपेक्षाओं से?
अब जब भी मिलते हो
एक अदृश्य मेज़
हम दोनों के बीच होती है —
तुम उस पार,
मैं इस पार,
और बीच में बिखरे पड़े हैं
वो सारे पल जो कभी हमारे थे।काश!कोई उठाता उन्हें,
काश!कोई तोड़ता यह मेज़ —
और एक बार फिर से
बिना "आप" के
बस "तुम" कहकर बुलाता।
पर शायद औपचारिकता ने
"तुम" को भी"आप" बना दिया है —और कुछ रिश्ते
बस यूँ ही जीते-जीते
मर जाते हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







