जिंदगी नहीं, मैं देखता हूं अथाह अकेलेपन को,
मैं देखता हूं कि स्थिर क्या है क्या यह रह सकता है, उदासीनता, अचानक, युद्ध, बेचैनी, घबराहट, अनजाना विश्वास, कमजोरी, आलस, अंधेरा, थोड़ी देर कुछ मिल जाना,
तुम पूरे संसार, ब्रह्मांड में देख लो कुछ नहीं है अथाह अकेलापन है,,
सब देखते हो एक दूसरे में खोए हुए हैं लेकिन जो पूरे ब्रह्मांड में फैला है वो अथाह अकेलापन है,
सिर्फ 800 अरब ही तो लोग हैं लेकिन अकेलापन तो अनंत है,एक ही बात है, जिंदगी में एक अकेले का होना पूरे संसार में कितना मुश्किल रहा होगा, शायद यहीं से जिंदगी शुरू हुई, कुछ बंधन आए, नियम आए और अनेक आते गए।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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