जिसे अक़ीदत कहते है,
वो कोई
विश्वास नहीं,
स्वीकृति है,
मौन स्वीकृति।
वह प्रश्नों से भागती नहीं,
पर,
उत्तर भी माँगती नही।
वह जानती है,
कुछ पूर्ण नहीं,
फिर भी,
उसके लिए अपूर्ण कुछ नहीं।
वो,
जरूरत की उपज नहीं,
चयन की देन है।
वो,
अधिकार नहीं चाहती,
वह तो,
मुक्त करना जानती है,
बाँधना नहीं।
वो,
चयन है,
दूर जा सकने का सामर्थ्य होते हुए भी,
ठहर जाने का ।
पर जब,
उस ठहराव में
अपेक्षा उग आती है,
तो अक़ीदत
भार बन जाती है।
जहाँ स्वतंत्रता
साँस ले सके,
और अपेक्षा का स्थान न हो,
वहीं अक़ीदत
पवित्र रहती है।
अन्यथा
वह श्रद्धा नहीं,
एक मौन वेदना बन जाती है।
जो भीतर-भीतर
बहती रहती है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







