॥ आवर्त-चेतना ll
खड़ा भीड़ के मध्य आज तू, क्यों सन्नाटा ओढ़ा है?
किस भय की जंजीर ने, तेरा साहस-नाता तोड़ा है?
तू कहता है—क्रांति हो गई, नया दौर अब आया है?
पर देख गौर से—भीड़ बदल कर, तूने क्या ही पाया है!
'भीड़-बागी-फिर भीड़'—यही क्या इतिहासों का पहिया है?
सत्य वही, जो भँवर-बीच भी, अपनी स्वयं खिवैया है।
जो आज खङ्ग ले सत्य का, तम को चीर निकलता है,
कल वही सत्य, सिंहासन बन, फिर जड़ता में पलता है।
रे मनुज! इस बाह्य-तंत्र से, क्या साध्य कभी मिल पाता है?
जब तक न हृदय की भूमि बदलती, दुख ही तो उग आता है।
मशीन-यंत्र की ओट लिए, तू मानवता को भूल गया,
निज 'हया' गँवाकर, आधुनिकता के झूठे झूलों में झूल गया।
सत्य नहीं वह, जो मस्तक की गिनती पर इठलाता है,
सत्य वही, जो अकेला खड़ा, सूरज-सा तपता जाता है।
भीड़ तो केवल देह-सुरक्षा, मन को दीन ही करती है,
पर जाग्रत-चेतना की पीड़ा ही, नव-युग को जनती है।
छोड़ मोह का जर्जर नीड़, तू नूतन-पथ स्वीकार कर,
पर याद रहे—चेतना विदीर्ण हो, ऐसा ही आविष्कार कर।
क्रांति नहीं वह, जो केवल ईंटों को ही बदल सके,
क्रांति वही, जो मन के भीतर के, कलुषों को मसल सके।
अकेला खड़ा जो व्यक्तित्व आज, वह काल-जयी इतिहास बनेगा,
भीड़ के गंदे कोलाहल में, वही सत्य का अट्टहास बनेगा।
लिख स्वयं अपनी नियति-तहरीर, तू समय का महा-प्रवाह बन,
भीड़ तज, निज सत्व संग जी—तू स्वयं अपना खेवनहार बन। ।
[(आवर्त-चेतनावाद)]
[(भीड़ केवल देह की सुरक्षा का एक छलावा है, जिसके भीतर एक भयावह और रिक्त सन्नाटा व्याप्त है। जहाँ हज़ारों का कोलाहल है, वहाँ वास्तव में कोई संवाद नहीं, केवल एक सामूहिक शून्यता है जो मनुष्य को मात्र एक 'संख्या' बना देती है। इस भीड़ के तंत्र में व्यक्ति का निजत्व और उसके हृदय का चयन कहीं खो जाता है। इतिहास का सबसे बड़ा और क्रूर विरोधाभास यही 'भीड़-बागी-भीड़' का चक्रीय सत्य है। जब कोई अस्तित्व सत्य की प्रखरता के साथ खड़ा होकर प्रचलित जड़ता को चुनौती देता है, तो वह 'बागी' कहलाता है। किंतु विडंबना यह है कि जैसे ही वह बागी विचार लोक-स्वीकार्य होकर किसी 'सत्ता', 'संगठन' या 'परंपरा' का रूप लेता है, वह स्वयं एक नई और जड़ 'भीड़' में तब्दील हो जाता है। इस प्रकार, जो आज की ज्वलंत क्रांति है, वह कल की सड़ी-गली रूढ़ि बन जाती है।
यही कारण है कि बाहरी व्यवस्था या 'सिस्टम' को बदल देना मात्र एक व्यर्थ की कसरत सिद्ध होती है, यदि मनुष्य के अंतर्मन के विकार और कलुष नहीं बदले। यदि भीतर का लोभ, मोह और अहंकार यथावत रहा, तो संसार का हर नया आविष्कार और हर नया तंत्र केवल पुराने दुखों का ही एक परिष्कृत चेहरा बनकर रह जाएगा। किसी भी नूतन प्रगति या बदलाव की वास्तविक कसौटी यही है कि वह मनुष्य की मौलिक संवेदना और उसकी 'हया' (नैतिक गरिमा) को कितना सुरक्षित रख पाती है। यदि विकास की अंधी दौड़ मानवता को ही एक वस्तु बना दे, तो उसे प्रगति नहीं, बल्कि चेतना का पतन ही माना जाना चाहिए।
सत्य कोई ऐसी मंजिल या पड़ाव नहीं है जहाँ पहुँचकर चैन से सो जाया जाए। सत्य तो एक निरंतर और प्रवहमान 'जाग्रत अवस्था' है। जो इस यात्रा में कहीं ठहर गया, वह तत्काल भीड़ का हिस्सा बन गया; और जो प्रतिपल सजग रहकर बहता रहा, वही वास्तव में सत्य से सिक्त रहा। जागृति अक्सर एक गहरी पीड़ा लेकर आती है, क्योंकि यह पुराने मोह के जर्जर नीड़ को तोड़ने की मांग करती है। असली नायकत्व उसी व्यक्तित्व में है जो इस पीड़ा को सहकर भी भीड़ के गंदे शोर से दूर, अपनी 'किस्मत की तहरीर' स्वयं लिखने का साहस रखता है। अंततः, मुक्ति भीड़ से पलायन करने में नहीं, बल्कि भीड़ के बीच रहते हुए भी उसके 'मानसिक संक्रमण' से अपनी चेतना को बचाए रखने और स्वयं अपना 'खेवनहार' बनने में निहित है।)]
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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