"रूबाई"
कुछ पल की हॅंसी दे के ये ता-उम्र रुलाती!
या रब तिरी दुनिया मुझे इक ऑंख न भाती!!
कम-बख़्त बुढ़ापा कभी आ कर नहीं जाता!
मद-मस्त जवानी कभी जा कर नहीं आती!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
© Parvez Ahmad

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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"रूबाई"
कुछ पल की हॅंसी दे के ये ता-उम्र रुलाती!
या रब तिरी दुनिया मुझे इक ऑंख न भाती!!
कम-बख़्त बुढ़ापा कभी आ कर नहीं जाता!
मद-मस्त जवानी कभी जा कर नहीं आती!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
© Parvez Ahmad
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