Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

"नारी: त्याग से स्वाभिमान तक”

"नारी: त्याग से स्वाभिमान तक”

स्त्रियाँ जब भोजन पकातीं,
तब अन्नपूर्णा बन क्षुधा मिटातीं।
अपने बच्चों से बात कर तुतलातीं,
तब सरस्वती बन अक्षर ज्ञान सिखातीं।

जब श्रृंगार से बिंदिया का होता लश्कारा,
लक्ष्मी बन लाती संपत्ति का उजियारा।
जब अपने परिवार का बनतीं सहारा,
शक्ति स्वरूपा पार्वती बन हरतीं कष्ट सारा।

जब प्रजनन अंग से उत्पन्न करें संतान,
माँ कामाख्या सा पातीं वो सम्मान।
जब वनवास में साथ चलें धर मुस्कान,
ऐसी स्त्री सीता बन होती स्वयं राम का स्वाभिमान।

कर्तव्य निभातीं बिना अश्रु बहाए,
ऐसी नारी ही उर्मिला कहलाए।
अपनी कलम से नारी का चरित्र लिखती जाए,
ऐसी स्त्री एक दिन कवयित्री "पल्लवी" सी बन जाए।

जब अन्याय के सम्मुख स्वर बुलंद हो जाए,
माँ दुर्गा बन दुष्टों का संहार कर जाए।
जब अधर्म के आगे न शीश झुकाए,
माँ काली बन अन्याय को मिटाए।

जब अपनों के दुःख में नयन भर आएँ,
माँ यशोदा बन ममता के दीप जलाएँ।
जब रूठे हुए रिश्तों को प्रेम से मनाएँ,
राधा बन प्रेम की परिभाषा समझाएँ।

जब घर की चौखट से सपनों को उड़ान मिले,
जब उसके परिश्रम को भी एक पहचान मिले।
जब उसके निर्णय को परिवार का सम्मान मिले,
तब उस नारी को अपने अस्तित्व का आसमान मिले।

जब तपती धूप में परिवार के लिए छाँव बन जाए,
अपने हिस्से की खुशियाँ भी अपनों पर लुटाए।
जब टूटकर भी हर बिखरे रिश्ते को सजाए,
वो "सावित्री" बन काल से भी लड़ जाए।

जब ज्ञान की ज्योति से अज्ञान मिटाती,
"गार्गी" बन तर्कों की शक्ति दिखाती।
जब समाज की रूढ़ियों को चुनौती दे जाती,
"मैत्रेयी" बन नई चेतना जगाती।

जब रणभूमि में शत्रुओं से लोहा लेती,
"रानी लक्ष्मीबाई" बन तलवार उठा लेती।
जब देश की खातिर अपना सर्वस्व लुटाती,
भारत माता की वीरांगना कहलाती।

जब खेतों में पसीने से धरती महकाती,
अपने श्रम से अन्न के भंडार भर जाती।
जब मजदूरी कर परिवार का पेट पालती,
वो श्रम की देवी बन जीवन सँभालती।

जब अपनों की खातिर खुद को भुला देती,
अपने सपनों को भी चुपचाप सुला देती।
जब सबके चेहरे पर मुस्कान सजा देती,
वो अपनी पीड़ा को हँसी में छिपा लेती।

पर कब तक नारी त्याग की मूरत कहलाए?
कब तक हर पीड़ा को चुपचाप सहती जाए?
कब उसके हिस्से में भी खुशियाँ आएँ?
कब उसके सपने भी पंख फैलाएँ?

क्यों उसके त्याग को ही धर्म बताया जाता है?
क्यों उसके मौन को ही सहनशीलता कहा जाता है?
क्यों उसकी इच्छाओं को पीछे रखा जाता है?
क्यों उसके अस्तित्व को रिश्तों में तौला जाता है?

वो केवल किसी की बेटी या पत्नी नहीं,
वो केवल किसी की माँ या बहन नहीं।
उसका अपना भी एक संसार होता है,
उसके भीतर भी सपनों का विस्तार होता है।

वो चाहे तो पर्वत से टकरा सकती है,
वो चाहे तो सागर भी लाँघ सकती है।
अपने साहस से इतिहास बदल सकती है,
अपने विश्वास से नई राहें गढ़ सकती है।

वो घर की तुलसी, वो आँगन की शान,
वो जीवन का संगीत, वो रिश्तों की जान।
वो धैर्य की मूरत, वो साहस की पहचान,
वो सृष्टि का आधार, वो प्रकृति का वरदान।

पर नारी को देवी कहकर पूजना ही पर्याप्त नहीं,
उसके जीवित अस्तित्व का सम्मान भी आवश्यक है कहीं।
उसकी स्वतंत्रता, उसके अधिकारों को स्वीकार करो,
उसके सपनों को भी अपने सपनों-सा प्यार करो।

उसे मंदिरों में पूजने से पहले मन में स्थान दो,
उसकी चुप्पी नहीं, उसकी आवाज़ को सम्मान दो।
उसके त्याग की नहीं, उसके अस्तित्व की पहचान करो,
वो जो बनना चाहे, उसे बनने का आसमान दो।

क्योंकि नारी केवल पूज्यनीय प्रतिमा नहीं,
वो किसी की दया की पात्र नहीं।
वो स्वयं में संपूर्ण एक संसार है,
उसके होने से ही जीवन में बहार है।

नारी को न किसी उपमा की दरकार है,
न किसी प्रमाणपत्र की, न किसी उपकार की।
उसका होना ही अपने आप में एक पहचान है,
उसकी स्वतंत्र चेतना ही उसका स्वाभिमान है।

तो आओ, हर नारी को उसका अधिकार दिलाएँ,
उसके सपनों को नई उड़ान दिलाएँ।
देवी कहने से पहले इंसान समझ पाएँ,
और उसके सम्मान से एक सुंदर समाज बनाएँ।

क्योंकि नारी केवल शक्ति का नाम नहीं,
वो प्रेम, संघर्ष और विश्वास की पहचान है।
वो कल भी सृजन थी, वो आज भी सृजन है,
वो आने वाले कल का भी स्वाभिमान है।

नारी को नमन, उसके अस्तित्व को प्रणाम,
उसके साहस को सलाम, उसके स्वाभिमान को सलाम।
वो स्वयं में शक्ति, वो स्वयं में सम्मान,
वो ही सृष्टि की जननी, वो ही सृष्टि की आधार।

रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)
दिनांक १३/१०/२०२६




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