शीर्षक: शहर और हम
शहर और हम लोगों का अटूट बन्धन बन गया है।
ना हम शहर छोड़ना चाहते है क्यों कि इससे दूर रहना हमे सताता है।
बचपन से पचपन की ता उम्र इसकी गलियों में गुजरी है।
बच्चे बड़े होकर महानगरों में रहने लगे है।
हम भी अपने बच्चों के साथ रहने के लिए महानगरों में चले गए।
दो तीन दिन तो बहुत अच्छा लगा मगर कुछ कुछ कमी महसूस होने लगीं।
बच्चों ने पूछा किस बात की उदासी आई है।
किसी ने आपको भला बुरा कहा हो तो बताओं पिताजी।
ऐसी कोई बात नहीं है बेटा मुझसे नहीं सही जा रही अपने शहर की जुदाई।
मेरा वहां दिल बसता है। वहां की गलियों सड़कों चौराहों बाजारों लोगों का व्यवहार त्यौहार की रौनक होली का रंग मिठाई की खुशबू दशहरा मेला दूध जलेबी गुलाबजामुन बनाने वाले हलवाई वहां के पशु पक्षी प्यारे खेल के मैदान मंडी का अनाज दोस्तों का मज़ाक प्रातःकालीन भ्रमण का आनन्द बचपन से अब तक के दिन मुझे अपने शहर की और बुला रहे है। यहां रहूंगा तो पागल हो जाऊंगा तू मेरा सामान लेकर आ मुझे मेरे शहर को जाना है।
महानगर की इस चार दिवारी में मेरा मन घुट रहा है।
बेटा बोला पिताजी सच कहा आपने में भी जब अपने शहर से पढ़ने यहां आया था तब मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ था। मगर बड़ी मुश्किल से मैने यहां तालमेल बैठाया है।
हम लोगों को अपने शहर की यादों ने बहुत रुलाया है। अब मेरा भी मन बन गया है। में भी छोटा मोटा कोई व्यवसाय अपने शहर में कर लूंगा। इतना कहकर सब अपने शहर को जाते है।
शहर और हम लोगों का अजीब अटूट बन्धन बन गया है। न तो हमसे शहर छूटता न अपने शहर की जुदाई सही जाती है।
सत्यवीर वैष्णव बारां राजस्थान 💞💞✒️💞💞


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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