"काम करते हुए लोग..."
जब मेरी माँ चूल्हे पर रोटी सेकती है,
प्यार की आँच में हर दर्द सेंकती है।
बिखरे बाल, माथे पे पसीने की लकीर,
उस पल वो लगती है सबसे खूबसूरत तस्वीर।
जब मैं होती हूँ अध्ययनरत,
शब्दों को कलम से रचती हूँ रचना सुंदर।
शब्दों को सजाती हूँ सुंदर,
कभी लट को संभालती,
और होती पसीने से तर-बतर,
तब कहीं जाकर बनती है एक रचना सुंदर।
जब किसान हल लेकर खेत जोतता है,
धरती की कोख में सोना बोता है।
धूप में तपता, मिट्टी से सना बदन,
उसका श्रम ही है सबसे पावन दर्पण।
जब बढ़ई लकड़ी पर रंदा चलाता है,
हर बुरादे में एक सपना बनाता है।
आरी की आवाज़ में संगीत बजता है,
उसके हाथ का हुनर सबसे सजता है।
जब मोची फटे जूतों को सिलता है,
टूटी उम्मीदों को फिर से सीता है।
सुई-धागे से जोड़ता है राहें नई,
उसकी दुकान लगती है दुआओं सी सही।
जब दर्जी कपड़े पर कैंची चलाता है,
नाप-जोख में रिश्ते भी सिलता है।
एक-एक टाँके में ममता पिरोता है,
वो फटा आँचल भी राजा सा लगता है।
जब रिक्शेवाला पैडल मारता है,
अपने कंधों पर घर का भार तारता है।
धूप हो या बारिश, रुकता नहीं कभी,
उसकी हिम्मत के आगे झुकती है हर कमी।
जब अध्यापक ब्लैकबोर्ड पर लिखता है,
अक्षर-अक्षर में भविष्य रचता है।
चॉक की धूल में चमकता है नूर,
काम करते वो लगता है सबसे मशहूर।
सौंदर्य न गोरा रंग, न महँगे लिबास,
सौंदर्य है वो लगन, वो मेहनत, वो आश।
जो काम में डूबा, वही सबसे हसीन,
चाहे माँ हो, बेटी हो, या किसान।
सौंदर्य श्रम में है, पद में नहीं,
कुर्सी पर बैठा हो या सड़क पर कहीं।
जो ईमान से रोटी कमाता है,
वही इस दुनिया का असली चेहरा बनाता है।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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