"पृथ्वी पर मोक्ष नारी का"
"मैं भी नर हूं, बचपन में बालक, और युवा, अंत में पुरुष ये तो ठीक है पर बात क्या किसी बालिका, महिला, नारी युवती की नहीं होगी क्या, समाज में बालक होने की खुशी है पर बालिका पर केवल प्रश्न चिन्ह, ऐसा क्यों? बालक के लिए प्रकृति, समाज और संसाधन सब है और वहीं बालिका के लिए कुछ नहीं ये गलत है और निश्चय एक युवती के अस्तित्व को नकारने के समान है, समाज एक महिला के लिए ऐसे मापदण्ड तैयार करता है जैसे वो किसी अमुक वस्तु के समान हो, और गांव के प्राणी तो अलग ही ख्याल में चलते हैं, आज भी वैसी स्थिति है कि जो भी दोषी देना हो वो नारी को देना है, इतनी गहरी खाई पुरुष सत्तात्मक समाज और उन बूढ़ी महिलाओं की देन है जिन्होंने अपने ऊपर हो रहे मनोवैज्ञानिक हमलों को सहन किया और समाज को दूषित करने में अपना योगदान दिया, आज भी हालात वैसे, नारी के लिए संघर्ष सिर्फ संघर्ष, और ना नारी ने सचेत आवाज उठाई ना ही पुरूषों इस खोखली मोहब्बत को छोड़ा, शरीर का विज्ञान तो नहीं समझा और शरीर के भोग में लिप्त हो गए, वैसा ही समाज बना है जहाँ आवाज ही मौन में मर चुकी है और सिर्फ अचेतन का शोर दुनिया में चेतनता देकर एक धड़ल्ले का काम कर रहा है, प्रेम कम प्यासें ज्यादा है भूखे कम भुक्कड़ ज्यादा है"
- ललित दाधीच।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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