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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

"मैं और मेरी कलम"

"मैं और मेरी कलम"

मेरे हाथ में कलम नहीं,

मेरे हाथ में तूफान है।
जब दुनिया सवाल पूछती है,

मेरी कलम जवाब लिखती है।

जब लोग मुझे चुप कराते हैं,

मेरे शब्द दीवारें तोड़कर बोलते हैं।

मेरी कलम में स्याही नहीं बहती,

उसमें सदियों का मौन बहता है।
उन औरतों की चीखें हैं इसमें,

जिन्हें कभी मंच नहीं मिला।
उन बच्चों के सपने हैं इसमें,

जो भूख के आगे बिक गए।

जो जख्म नहीं देती मेरी कलम,

बस अंधेरों में उजाले की राह बनती है।
कभी वो टूटे हुए घरों पर मरहम रखती है,

कभी झूठ के ताज पर सवाल दागती है।
कभी अनजान आँखों का आँसू पोंछती है,

कभी सोई हुई इंसानियत को जगा देती है।

सुबह अखबार में छपती है खबर,

शाम तक लोग भूल जाते हैं।

पर मेरी कलम उसे कविता बना देती है,

ताकि दुनिया 100 साल बाद भी याद रखे।

लोग पूछते हैं "लिखकर क्या बदलेगा?"

मैं मुस्कुराकर कहती हूँ "एक उम्मीद जगेगी"
वो उम्मीद जो मेरे बाद भी,

किसी और की कलम में सांस लेगी।वो आवाज जो ताले तोड़ेगी,

वो रोशनी जो बंद कमरों में जाएगी।

मेरी कलम मेरा मंदिर है,

मेरी कलम मेरी प्रार्थना है।

मेरी कलम मेरा घर है,

जहां मैं बिना डरे रह सकती हूं।
मेरी कलम मेरा हथियार है,

जिससे मैं बिना खून बहाए जंग जीतती हूं।

ना तलवार चाहिए मुझे,

ना तख्त चाहिए...

ना भीड़ चाहिए,

ना तालियां चाहिए...
बस एक कोरा कागज,

और सच बोलने की हिम्मत चाहिए।

कहते हैं जमाना बदल गया,

कलम की ताकत कम हो गई।

मैं कहती हूं जमाना बदला है,

पर सच की भूख वही है।
स्क्रीन आए, मोबाइल आए,

पर दिल को छूने के लिए

आज भी शब्द ही चाहिए।

इसलिए जब तक धड़कन है,

तब तक स्याही बहेगी।
जब तक सांस है,

तब तक कविता जिएगी।
क्योंकि जिस्म मिट्टी हो जाते हैं,

नाम मिट जाते हैं,

पर शब्द...

शब्द अमर हो जाते हैं।

रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (2)

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Lekhram Yadav said

बहुत खूबसूरत और लाजवाब रचना आपको सादर नमस्कार

रीना कुमारी प्रजापत said

मैं मुस्कुराकर कहती हूँ "एक उम्मीद जगेगी"
वो उम्मीद जो मेरे बाद भी,

किसी और की कलम में सांस लेगी।वो आवाज जो ताले तोड़ेगी.....लाजवाब .....आप बहुत ही खूबसूरत लिखती हैं पल्लवी जी आपकी हर रचना में चार चांद लगे होते हैं

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