जिद्दी हूँ, गुस्से वाली हूँ,
ख़ुद पर अब मेरा बस नहीं चलता।
सबर और बर्दाश्त जैसे
मुझसे कब के रूठ गए हैं।
सबको खो देने का डर
हर साँस के साथ जीती रही,
पहले ख़ुद से पहले
मैं हर किसी का ख़्याल रखती रही।
अब वो मैं नहीं रही।
अब किसी के ज़ख़्मों पर
मरहम लगाने नहीं जाती,
पहले जो हर रोते चेहरे को
अपना कंधा दे देती थी,
अब किसी को भी नहीं देती।
सब छोड़ देते हैं एक दिन,
ये बात अब समझ आ गई।
बस अफ़सोस इतना है
कि मेरी हिम्मत भी
अब साथ निभा नहीं पाई।
इतना ख़र्च कर दिया ख़ुद को
हर किसी की तसल्ली में,
कि जब हिसाब मेरी बारी आया
तो मेरी झोली में
मैं ही नहीं बची।
— Gitanjali Gavel ✍️


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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