ज़मीर का मुक़द्दमा: नेता की अंतिम बात
ये जुबाँ तो कल तक वोट का बाज़ार थी, आज क़र्ज़दार रहा हूँ, हर उस आँख का,
वो हाथ जो मंच पे उठा, वो सिर्फ़ ख़ुद को पुकारता रहा; असल में तुम्हारी आवाज़ तो कभी सुनी ही नहीं मैंने।
मैंने सब को ख़रीदा, फ़िर ख़ुद को बेचा, यही सियासत थी मेरी, वो आँसू जो कैमरे पे गिरा, वो ज़मीर की पहली ख़ामोश सिसकी थी।
मैं तमाम उम्र इंतज़ार करता रहा उस पल का, कि मेरा भीतर का झूठ ख़ुद ही जाग उठे और सब कह दे।
ये कुर्सी नहीं थी, ये ग़ुलामी थी, जिसे तुम इज़्ज़त कहते थे, और मैं उस ग़ुलामी में तुम्हारे सामने राजा बनता रहा।
अब जब साँस टूट रही है, तो बस इतना सुन लो अवाम – मैं तुम्हारी उम्मीदों के क़ाबिल कभी नहीं था। ये मेरा अंतिम फ़ैसला है; और यही मेरा पहला सच रहा है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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