ये कैसी उम्मीदें खा गई हमारी नस्ले उदास हैं
खाद-पानी देकर भी हमारी फसले हताश हैं
उम्र ऐसी हैं ख़्वाब का सागर कम लगने लगे
असल में दो निवाले के रोजगार की तलाश है
पढ़-पढ़ उम्र जाया की और कुछ भी न हुआ
बड़ी-बड़ी डिग्रियों में तों अब पैसो का हास है
समाज परिवार पूछता है कुछ मक़सद हैं तेरा
फिलहाल जिंदगी क़ो ज़िंदा रखने का प्रयास है
उम्र गुजरने क़ो हैं ये दिल कैद परिंदा बना रहा
क़फ़स की तिलियों में अब आँसू की प्यास हैं
हक़ीक़त जीने नहीं देती ख़्वाब तंज कसते हैं
और नादानो में मुहब्बत बर्बादी का कयास हैं
ज़िंदा लाश हुए अपनों की बेड़िया निगल गई
आज़ादी तों अब मेरी नज़र में बस उपहास हैं
ये दुःख ये पीड़ा ये ज़र्फ़ कृष्णा ख़त्म नहीं होंगे
ये पैरहन-ए-रूह भी जैसे भीगा हुआ कपास है...
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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