युगों-युगों से पढ़कर भी मुझे कैसे न जाना तुमने
मैं सच कहती रही मगर फिर भी न माना तुमने
ख़ून हो या रुह इन रिश्तों में विश्वास अंधा होता है
अंधविश्वास न सही यथार्थ भी कहाँ पहचाना तुमने
आँखों में आँखें डालकर सच बोलने की हिम्मत रखो
पता है सच सुनकर न सुनने का किया था बहाना तुमने
रंज है मुझे कि क़त्ल हुआ निश्छलता व भरोसे का
वफ़ा के बदले वफ़ा नहीं मिलती ये अब जाना हमने


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







