तुम्हें जाना ही था तो ख़ामोशी से चले जाते,
मेरे दिल को यूँ समझाना ज़रूरी था क्या।
हमने माँगा था सिर्फ़ थोड़ा-सा अपना-सा रिश्ता,तुम्हें हर बार हमें आज़माना ज़रूरी था क्या।
तुम्हारी एक हँसी को हम मोहब्बत समझ बैठे,तुम्हें यूँ रोज़ नज़रें मिलाना ज़रूरी था क्या।
अगर मंज़िल में मेरा नाम लिखा ही नहीं था,मुझे रास्ते में यूँ अपना बनाना ज़रूरी था क्या।
हम तो ख़ुद ही तुम्हारी ख़ुशी में ख़ुश थे,
तुम्हें फिर भी हमें इतना रुलाना ज़रूरी था क्या।
अब जो कहते हो कि भूल जाओ पुरानी बातें,पहले उन बातों को इतना निभाना ज़रूरी था क्या।
— चुनचुन यादव ✍️


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







