इस कदर हैं हम गमों से चूर,
मीठे व्यंग्य बाणों को
सहने को है मजबूर।
है बहुत आसान दिल को आहत करना,
नुकीले शब्द बाणों के
तीर को चुभाना।
काश! की ज़िंदगी तू
बेमुरौवत न होती,
किसी को किसी के
सहारे की जरूरत न होती।
पर सुकून है हमें
सोचकर यही बात।
क्या हुआ गर आज है मँझधार में,
होंगे खुद ब खुद
इक दिन साहिल के पास में।
तृष्णा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







