इंतजार भी अब तो इंतज़ार क़ो कहने लगा हैं
ये मन और तन दोनों पगला के थकने लगा हैं
तुझें ग़र आना हैं तो अब लौट के आ ज़ालिम
ये सांस भी अब तो आते-आते रूकने लगा हैं
तुझसें बड़ा पत्थर तो ये पत्थर भी नहीं ज़ालिम
मेरे सामने पड़ा पत्थर फिर भी पिगलने लगा हैं
दर्द इस कदर कि अहसास भी दूजा पता नहीं
हवाओं के तेज़ तूफान में भी दम घुटने लगा हैं
ज़िस्म नहीं मन थकने तक मैं राह में बैठी रही
ये दिली इंतज़ार भी अब थक के रुलने लगा हैं
आस भी नहीं रही और अब सांस भी नहीं रही
मुबारक़ तुम्हें,ये ज़िस्म मिट्टी में बिखरने लगा हैं
ये कृष्णा क्या करे कि सुकूँ मिले तन-मन क़ो
मन थककर चूर होकर मौत क़ो तरसने लगा हैं
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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