कभी फुर्सत मिले
तो ज़िंदगी से पूछना,
सबसे अधिक थकान
पैरों में नहीं,
मन में उतरती है।
धूप केवल
आकाश से नहीं बरसती,
कुछ धूप
अपने ही लोगों के बदलते चेहरों से भी आती है,
कुछ उम्मीदों के टूट जाने से,
कुछ अपनों की ख़ामोशी से।
ऐसे समय में
बहुत कुछ नहीं चाहिए होता—
न कोई बड़ा सहारा,
न कोई लंबा उपदेश।
बस...
किसी अपने का यह कहना—
"मैं हूँ न..."
और सच मानिए,
इतना भर ही
जीवन की सबसे गहरी छाँव बन जाता है।
थोड़ी सी छाँव...
एक माँ की हथेली है,
जो बुख़ार में तपते माथे पर
चुपचाप उतर आती है।
थोड़ी सी छाँव...
पिता की वह खामोश चिंता है,
जो कभी शब्द नहीं बनती,
पर पूरी उम्र
संतान के रास्तों पर बिछी रहती है।
थोड़ी सी छाँव...
किसी मित्र का कंधा है,
जहाँ आँसू
अपना परिचय नहीं पूछते।
और कभी-कभी,
थोड़ी सी छाँव
किसी अजनबी की मुस्कान भी होती है,
जो यह विश्वास लौटा देती है
कि दुनिया अब भी रहने लायक़ है।
हम सब
अपनी-अपनी धूप में जल रहे हैं।
किसी की आँखों में
रोटी की चिंता है,
किसी के हृदय में
रिश्तों का सूखा पड़ा है,
किसी के सपने
हर सुबह टूटकर बिखर जाते हैं
याद रखिए—
दुनिया को हमेशा
बड़े लोगों की नहीं,
बड़े दिलों की ज़रूरत होती है।
क्योंकि
इतिहास महलों से नहीं,
करुणा से लिखा जाता है।
और मनुष्य की सबसे सुंदर पहचान
उसकी ऊँचाई नहीं,
उसकी छाया होती है।
यदि जीवन के अंत में
कोई एक व्यक्ति भी
हमारे लिए यह कह दे—
"जब सारी दुनिया धूप बन गई थी,
तब यह इंसान
मेरे हिस्से की थोड़ी सी छाँव बन गया था..."
तो विश्वास मानिए,
यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







