भोर की अगली बेला,
दिनमणि ने बाहें फैला -फैलाकर
धरांगन में, चहुं -दिशी,बिछा दी
स्वर्ण -आभित,महीन ओढ़नी,
खग-मृग-सिंह,कीट -पतंगे
चराचर -जगत में संचारित
नव ऊर्जा से,भर गई है, अंगड़ाइयां
पांवों में, पंखों में, पत्तों में,
शाखाओं में,आ गयी है,
निरंतरता की नवीनतम अभिलाषा
सागौन,साल,सीसम,कोसम,तेंदू
नीम, पीपल,बरगद,आम, अमरूद
सभी के पत्ते -पत्ते, डालियां -डालियां
खींच -खींचकर स्वयं को
ढंक लेना चाहतें हैं,किरण-ओढ़नी से,
पौष की ठंडी रात में,
कंबल ओढ़े बच्चों की तरह,
मां के आंचल में छिपे
नटखट- नादान-निर्मल-चित
शिशुओं की तरह,
खुली -विस्तृत धरांगन में
बिछी मखमली हरी दूब
लालायित हैं, आकर्षित हैं,
स्वर्ण -किरण-पुंज की
रूमरूमाती स्पर्श पा लेने को,
निर्झर, नदियां,पोहरे,ताल की
चंचलता में समाहित हैं
एक कौतुहलता,जो
प्रतिक्षारत हैं,कि,
उड़ती-लहराती-पीली-चमकती
ओढ़नी आकर ढंक लें,
तुषार -गुच्छ से आच्छादित
पर्वत मालाएं अपनी धवलांगन को
स्वर्णित करने, जैसे निवेदन कर रहें हों,
पूरब की आरंभ से,
इठला रहीं हैं,विटप-शिखाएं
इन देव-मुकुट सी चमकती
कनकमयी किरण - पुंज को
अपनी शीश में पाकर,
बुलबुल,कोयल,मोर, पपीहा
की जिव्हा तले,एक नूतन तरंगें
आ, खेलने लगीं हैं,
मधुमयी मिठास लेकर,
भोर की अगली बेला की
जलती कुंदन -ढेरी से
उत्सर्जित कंचन -किरण-पुंज
समग्र धरती मुस्करा रही है।।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







