एक दिन चुपके से
मिट्टी ने मुझसे पूछा—
“तू मुझे पहचानता है?”
मैंने कहा—
“हाँ…
तू वही है,
जिस पर मेरा घर खड़ा है।”
मिट्टी मुस्कुराई और बोली—
“नहीं,
मैं सिर्फ़ तेरे घर के नीचे नहीं,
तेरी हर साँस के भीतर हूँ।”
नदी किनारे बैठी थी,
धीरे-धीरे बह रही थी।
मैंने पूछा—
“तू इतनी दूर कहाँ जाती है?”
नदी बोली—
“जहाँ प्यास होती है,
वहीं मेरा रास्ता बन जाता है।”
पास खड़ा बूढ़ा पेड़
हवा में झूमकर कहने लगा—
“मैंने धूप सहकर
तुझे छाँव दी,
तूने मुझे काटकर
अपनी छत बना ली।”
किसान दूर खेत में
मिट्टी से बातें कर रहा था।
उसके हाथों में दरारें थीं,
लेकिन आँखों में उम्मीद थी।
मैंने पूछा—
“तुझे थकान नहीं होती?”
वह मुस्कुराया—
“थकता तो हूँ,
लेकिन जब खेत मुस्कुराता है,
मेरी सारी थकान
फसल बनकर लौट आती है।”
तभी आसमान से
एक बूंद मेरे हाथ पर गिरी।
बारिश बोली—
“तुम इंसान हो न?”
मैंने कहा—
“हाँ।”
वह बोली—
“तो फिर याद रखना—
तुम्हारे पास जो कुछ है,
वह तुम्हारा अकेले का नहीं।”
मैंने चारों ओर देखा—
नदी बह रही थी,
पेड़ साँस ले रहे थे,
मिट्टी खुशबू दे रही थी,
किसान पसीना बहा रहा था,
और सूरज सबको
एक-सी रोशनी दे रहा था।
उस दिन समझ आया—
आदमी बड़ा होकर
प्रकृति से ऊपर नहीं उठता,
बल्कि प्रकृति को समझकर
सच में इंसान बनता है।
और जाते-जाते मिट्टी ने कहा—
“जब दुनिया तुझे भूल जाए,
तब मेरे पास लौट आना…
मैं तेरा नाम नहीं पूछूँगी,
बस अपनी गोद में जगह दे दूँगी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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