सुबह की पहली किरण के साथ,
शुरू होती है वही पुरानी दौड़,
पोर्टल पर फॉर्म भरना, रिफ्रेश करना,
और उम्मीद के धागों को जोड़ना।
आईने के सामने खड़े होकर सोचना—
क्या सच में कोई कमी मुझमें ही है?
या वक्त ही मेरे खिलाफ खड़ा है?
घर से फोन आने पर आवाज़ बदल लेना,
कह देना—"बस पापा, प्रक्रिया चल रही है"—
ताकि उनकी आँखों की नींद न उड़े,
ताकि उनकी उम्मीद का दीया बुझ न जाए।
चाय की उस गुमटी पर बैठना,
जहाँ लोग पूछते हैं—"कहाँ तक पहुँचे?"
उनके उन तीखे सवालों से बचकर,
नज़रें झुकाकर चुपचाप निकल जाना।
ये सन्नाटा बहुत चीखता है रात में,
जब कमरे की चार दीवारें पूछती हैं—
"बता, कल का सूरज क्या लेकर आएगा?"
जवाब किसी के पास नहीं,
बस एक जिद है—कि टूटना नहीं है!


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







