"दर्द होता तो भुला देता,
अगर दिख जाता,
तो जख्म लगा देता,
जान जाता तो,
कोई नमक लगा देता,
दर्द का एक हिस्सा,
अगर मुझे बता देता,
तो मैं ही,
दर्द को उसकी जगह दिखा देता,
सारे जहां में ढूंढकर,
मुझ तक आ गया,
मेहमान से बदलकर,
घर का मालिक बनकर आ गया,
एक ही दर्द काफी था,
ये हर तरीके से आ गया,
दर्द करता अगर,
तो दर्द को भी दवा देता,
मगर वो सुकून तो दर्द को,
मेरे सीने में रखें दिल से मिल गया,
मेरा सुकून तो दिल को भी ना मिला,
दिल को छुड़ाया तो,
दर्द सीने में मर गया,
दर्द को छुड़ाया तो,
दिल से खोखला इश्क़ बह गया,
पूरे दिल में छिद्र,
और घाव थे मेरे,
मैं क्या करता,
किसके पास जाता,
किसको आखिर वक्त तक बचाता,
मैं, दिल या दर्द को,
जहां राख भी है,
मिट्टी भी है,
और एक नजरिए में सबकुछ खाली भी,
भरा हुआ तो सिर्फ गूंजता हुआ शोर है,
जैसे जल्दी जल्दी सब करते रहे,
और पाँच वो काम सभी करते हैं,
हां भरपेट भोजन,
हां नींद लेना,
हां बाहर घूमना और खरीदारी करना,
हां वो बातें करना जो घर भीत की हो,
और संगीत सुनना,
तब ये जरूरी है कि,
दर्द अब अपनी पहचान से आए,
नहीं तो स्वीकार में सबक मिल जाए तो गिला नहीं।।"
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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