ज़मीं पर चाँद आए भी तो क्यों दिल शाद रहता है,
ये इंसाँ अपनी ही कमियों को आसमान कहता है।
कि क्या परवाह रफ़्त-ए-आसमाँ को शौहरत-ए-पा से,
क़दम इक जो उठाया है तो दूजा भी उठाना है।
सफ़र की इब्तिदा है रास्तों का ख़ाक उड़ाना,
ठहरने के ठिकाने दूरियों के बाद आना है।
ख़ुदी को अपनी जो मन्सूर सा बुलंद करना हो,
हज़ारों लाख बहाने दिल को अक्सर ढूँढ लाना है।
रहे मसरूफ़ वो औरों के दिल का खोट गिनने में,
जिन्हें दा'वा कि अपना दिल फ़क़त पाकीज़ा ख़ाना है।
अधूरे लोग जो ख़ामी से अपनी बे-ख़बर ठहरे,
उन्हें ज़िद है कि अंधों को ये पूरी महफ़़िल दिखाना है।
अजब रंजिश, अजब रज़ा है इस ज़ालिम ज़माने की,
सहज होने में ख़ुद के वास्ते सदियाँ बिताना है।
जो ज़रा सी चूक देखी दोस्तो ने पीठ फेर ली,
तेरी ग़लती पे अपनों को भी दूरियाँ बढ़ाना है।
कहाँ मुमकिन था सोचना 'ललित' तू सोचता क्या है,
ख़ुद अपने होने को ही हर नफ़स आज़माना है।
मगर ऐ 'दाग़' ज़माने का यही दस्तूर ठहरा है,
यहाँ तो जी के मरना और मर के जी जाना है।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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