एक बेटी जब जन्म लेती है, तो वह अपने साथ केवल एक नया जीवन नहीं लाती, बल्कि अनगिनत सपने भी लेकर आती है। उसकी पहली मुस्कान से लेकर उसकी पहली पढ़ाई तक, उसके हर छोटे-बड़े कदम में उसके माता-पिता अपना पूरा जीवन लगा देते हैं। वे उसे इस उम्मीद से बड़ा करते हैं कि एक दिन वह अपने जीवन का नया सफर शुरू करेगी, जहाँ उसे सम्मान, अपनापन और प्रेम मिलेगा। लेकिन कितनी विडंबना है कि उसी बेटी की विदाई के रास्ते में आज भी एक ऐसा शब्द खड़ा है, जिसने न जाने कितने घरों को उजाड़ दिया है—दहेज|
दहेज कभी भी परंपरा नहीं था। परंपरा वह होती है जो समाज को जोड़ती है, सम्मान देती है और मानवीय मूल्यों को मजबूत करती है। जो किसी की खुशियाँ छीन ले, किसी पिता को कर्ज़ में डुबो दे, किसी माँ की रातों की नींद छीन ले और किसी बेटी की जान तक ले ले, उसे परंपरा कहना परंपरा का अपमान है।
सबसे दर्दनाक बात यह नहीं कि दहेज माँगा जाता है। सबसे दर्दनाक बात यह है कि इसे कई लोग सामान्य मान चुके हैं। यह सामान्य नहीं है। सामान्य वह समाज होता है जहाँ बेटी को उसके संस्कारों से पहचाना जाए, उसके साथ लाए गए सामान से नहीं। जहाँ विवाह दो परिवारों का मिलन हो, न कि आर्थिक सौदेबाज़ी का मंच।
कितने ही पिता ऐसे हैं जो अपनी पूरी उम्र की कमाई केवल इसलिए खर्च कर देते हैं कि कहीं उनकी बेटी का सम्मान कम न हो जाए। कोई खेत बेच देता है, कोई मकान गिरवी रख देता है, कोई अपनी वृद्धावस्था की जमा पूँजी खत्म कर देता है। फिर भी कई बार माँगें खत्म नहीं होतीं। लालच का कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता। जो रिश्ता माँग से शुरू होता है, वह अक्सर सम्मान तक पहुँच ही नहीं पाता।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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