तुम तो असल में हमें प्रेमी समझ बैठे हो,
हम तो कब के प्रेम से दरकिनार किए बैठे हैं,
तुम तो हमें असल में हमें प्रेमी समझ बैठे हो,
जुगनू की जो आँखें हैं तारों को पुकार बैठी है,
चाँदनी रात में क्या कमी थी गुफ़्तगू ज़ब्त किए बैठे हो,
अकेले संग कैसी यारी है अंधेरे में ही ज़ख्म भरते हो,
तुम तो असल में हमें प्रेमी समझ बैठे हो,
हम तो आशिक हैं ही आवारा तुम क्यूँ दिल में रहते हो,
याद तो आई थी तुम्हारी तन्हाई के मोड़ पे,
प्रेम के सदस्य उलझ गए घर के इंतजार में,
मेरा तो महीना गुम गया नोटों के बाजार में,
अब ना कमाए तो क्या करें इंसानी नकाब में,
जान तो जब जाएगी अभी क्यूँ खुमारी लिए बैठे हो,
हम प्यार ही चाहते हैं तुम तो पर्दा किए बैठे हो,
हम भी फिदा ना हुए की चेहरों की शराब पी ले,
तुम्हारी ही कमी का नशा किए बैठे हैं,
तुमसे ना हुआ इंतजार,
हमें ही इंतजार किए बैठे हो,
तुम तो असल में हमें प्रेमी समझ बैठे हो,
तुम तो कब से प्रेम से नज़रे उठा के बैठे हो,
तुम असल में हमें प्रेमी समझ बैठे हो।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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