श्रम से जग का श्रृंगार,
श्रम से जीवन साकार।
मुट्ठी भर पसीना,
बनता है नगीना।
धरती हँसती है,
जब मेहनत बसती है।
हल की हर रेखा,
लिखती नई लेखा।
ईंटों का हर घर,
श्रमिक का है स्वर।
उसके कठोर हाथ,
रचते उजले प्रातः।
धूप उसे तपाती,
आशा मुस्कुराती।
भूखा रहकर भी,
दूसरों को खिलाता।
स्वयं कष्ट सहकर,
नगर नया बसाता।
श्रम उसका गौरव,
जीवन का उत्सव।
पर मिलता कब है,
पूरा उसका हक़?
यहीं शासक का,
आरम्भिक धर्म।
न्याय की ज्योति,
जन-जन में भरना।
शक्ति का उपयोग,
सेवा का संयोग।
राज नहीं केवल,
उत्तरदायित्व भी।
सिंहासन तभी,
सम्मानित होगा।
जब श्रमिक का भी,
जीवन सुरक्षित होगा।
नीति ऐसी हो,
सबका हित हो।
परिश्रम का फल,
सबको सरल मिले।
अधिकार के संग,
कर्तव्य भी पले।
श्रम हो सम्मान,
न हो अपमान।
शासक का वैभव,
जनता से है।
जनता का विश्वास,
सत्य से है।
श्रमिक की मुस्कान,
राष्ट्र की शान।
श्रम बने पूजा,
सेवा हो दूजा।
तीनों का मेल,
विकास का खेल।
जहाँ श्रम पूजित,
श्रमिक सम्मानित।
और शासक न्यायी,
वहीं समृद्धि आई।
यही राष्ट्रधर्म,
यही सच्चा कर्म।
यही उज्ज्वल पथ,
यही भारत का रथ।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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