ब्रज छोड़ के मत जइयो सावन का ये मौसम है
मोहि और न तरसइयो सावन का ये मौसम है।
पनियां भरन को आऊंगी पनघट पै सांवरे,
सखियों के संग न छेड़ना मुझको तू बावरे।
गगरी मोहे ऊंचइयो जरा हौले से उठइयो,
कंकर न मार जइयो सावन का ये मौसम है।
मैं जानती हूं जमुना तीर काहे तू आए,
हम गोपियों के जियरा को तू काहे चुराए।
जा लौट के घर जइयो माखन चुरा के खाइयो,
पर चीर ना चुरइयो सावन का ये मौसम है।
तुझे मेघों की कसम है बदलियों की कसम है,
तुझे झूलों की कसम है पटुलियों की कसम है।
बरसाने में तू अइयो झूला मोहे झुलइयो
फिर बांसुरी बजइयो सावन का ये मौसम है।
बारिश की फुहारों में अपने भीगेंगे बदन,
झुक जाएंगे फिर लाज से कजरारे ये नयन।
मधुबन में संग अइयो निधिवन में रात रहियो
फिर रास तू रचइयो सावन का ये मौसम है।
कर-कर के तेरी याद कुंज गलियां रोएंगीं,
दिन रात तेरी याद में पैजनियां रोएंगीं।
मोहि छोड़ के न जइयो मत बावरी बनइयो
अब और ना रुलइयो सावन का ये मौसम है।
तेरे संग में बचपन गया जवानी भी गई,
तुझे ढ़ूंढ़ने को अंखियों की ये ज्योति भी गई।
इस बार तू रुक जइयो सारी उमर न जइयो
कांथा मोहे लगइयो सावन का ये मौसम है।
ब्रज छोड़ के मत जइयो सावन का ये मौसम है
मोहि और न तरसइयो सावन का ये मौसम है।
गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर
@सर्वाधिकार सुरक्षित रचनाकार


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