अहंकार
कभी मुकुट पहनकर नहीं आता,
वह धीरे-धीरे
विनम्रता की देहरी लाँघता है,
और फिर
मनुष्य को यह भ्रम दे देता है
कि वही अंतिम सत्य है।
यहीं से
इतिहास करवट लेता है।
जो सिंहासन
जनता के विश्वास से बना था,
जब उसी जनता की आवाज़ से
डरने लगे,
तो समझ लेना चाहिए—
दीवारों में दरारें
बाहर से नहीं,
भीतर से पड़ चुकी हैं।
संवाद
लोकतंत्र की सबसे सुंदर भाषा है।
असहमति
उसका अपराध नहीं,
उसकी साँस है।
हर प्रश्न
विद्रोह नहीं होता,
कई बार
वह भविष्य की रक्षा का
सबसे ईमानदार प्रयास होता है।
आवाज़ों को दबाकर
कुछ समय के लिए
सन्नाटा तो खरीदा जा सकता है,
किन्तु
विश्वास कभी नहीं।
जनता की गरिमा
किसी भी पद,
किसी भी शक्ति,
किसी भी व्यक्तित्व से बड़ी होती है।
जो यह भूल जाता है,
वह अपने ही बनाए
ऊँचे शिखर से
सबसे पहले गिरता है।
इतिहास की धूल में
ऐसे अनेक नाम हैं,
जिन्होंने स्वयं को
देश से बड़ा समझ लिया था।
समय ने
उनके महलों की ऊँचाई नहीं,
उनके पतन की गहराई लिखी।
देश
किसी एक चेहरे का प्रतिबिंब नहीं,
करोड़ों चेहरों का विश्वास है।
जनता
भीड़ नहीं,
राष्ट्र की धड़कन है।
उसकी आँखों का सम्मान,
उसकी पीड़ा का उत्तर,
और उसकी बात का आदर—
यही किसी भी व्यवस्था की
सबसे बड़ी शक्ति है।
आइए,
मतभेदों को
मनभेद न बनने दें।
तर्क को
तलवार नहीं,
पुल बनने दें।
क्योंकि
जहाँ संवाद जीवित रहता है,
वहीं लोकतंत्र मुस्कुराता है।
और याद रखिए—
अहंकार का अंत
हमेशा पराजय में लिखा गया है,
जबकि विनम्रता
हर युग में
जन-मन का विश्वास बनकर
अमर हुई है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







