Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

स्त्री इंसान

तौहीन-ए-इंसानियत है, मुझे बस एक सामान समझना,
मैं स्त्री हूँ साहिब, मेरा वजूद भी इंसान समझना।
मत बांटो मुझे कि मैं कोई अलग मखलूक (हस्ती) हूँ,
जो धड़कता है सीने में, उसे भी दिल-ए-नादान समझना।

नुमाइश की कोई मूरत या बाज़ार की वस्तु नहीं हूँ मैं,तुम्हारी मर्ज़ी से जो बदले, वैसी फितरत नहीं हूँ मैं ,
अलग मत कर मुझे इंसानियत के इस जहाने से,
मैं स्त्री हूँ तो क्या, आखिर एक इंसान ही हूँ मैं।

जिसे तुम सिर्फ अपनी सहूलियत का सामान कहते हो,कभी तो सोचो, जिसे तुम महज़ एक नाम कहते हो,
वो स्त्री भी इक जीती-जागती इंसान ही है,
क्यों उसे इंसानियत से अलग सरेआम करते हो?

मुझे बाज़ार की वस्तु न समझ, मैं ज़िंदा हस्ती हूँ,
झुका दे जो तेरे दंभ को, मैं वो आज़ाद बस्ती हूँ।
अलग मत कर मुझे इंसानियत के इस तराज़ू से,
मैं स्त्री हूँ तो क्या, तुझसे ज़्यादा बुलंद हस्ती हूँ!

खिलौना समझकर खेलने की भूल मत करना,
मैं इंसान हूँ, मुझे पैरों की धूल मत करना।
रची है ईश्वर ने ये दुनिया मेरी ही कोख से,
मुझे अपनी हवस की नुमाइश का उसूल मत करना!

तुम्हारी सोच के पिंजरे में मैं परवाज़ (उड़ान) हूँ साहिब,जिसे तुम दबा ना सकोगे,
मैं वो आवाज़ हूँ साहिब।
मैं वस्तु हूँ न ज़ायदाद,
न भोग की कोई मूरत हूँ,
मैं स्त्री हूँ,
और इंसानियत का असली आग़ाज़ हूँ साहिब!

मैं भोग की वस्तु नहीं, तेरा काल बनके आई हूँ,
दबाया था जिसे तूने, मैं वो मशाल बनके आई हूँ।
अलग समझा अगर इंसान से,
तो चीर दूँगी दंभ तेरा,
मैं स्त्री हूँ, अपनी ही हिफ़ाज़त की ढाल बनके आई हूँ!

तुम्हारी सोच की औकात से बाहर की हस्ती हूँ,
न बिक पाऊँगी बाज़ारों में,
मैं वो नायाब बस्ती हूँ।
मिटा दूँगी वो हर पन्ना जहाँ मैं सिर्फ़ सामान हूँ,
मैं स्त्री हूँ, और खुद में खुदा का एक रूप-ए-इंसान हूँ!

खिलौना समझने की ये जुर्रत अब आखिरी होगी,
मेरी खामोशी जो तूने तोड़ी,
तो वो तबाही होगी।
न दे मुझे कोई दर्जा,
पर इंसानियत से मत बांट मुझे,
अगर ज़रा भी ज़ुल्म हुआ,
तो हर तख्त की बर्बादी होगी!

मत कर मुझे विच्छेद प्रकृति के इस चरम विहान से,
मैं वस्तु मात्र नहीं, संप्रभु हूँ अपने आत्मज्ञान से।
नमन कर मेरे वजूद को,
मैं ही सृष्टि की आदि-अंत हूँ,
मैं स्त्री हूँ,
मत आंक मुझे इंसानियत से अलग किसी विधान से।

तफ़रीक-ए-इंसानियत क्या,
मैं तो रूह का उनवान हूँ,कोई शय (वस्तु) नहीं बाज़ार की, मैं मुकम्मल जहान हूँ।
तेरी मर्ज़ी की जो मोहताज़ हो,
वो ज़मीं कोई और होगी,मैं स्त्री हूँ,
अपनी हयात का खुद ही सुल्तान हूँ।

अस्मिता मेरी न बंधेगी कभी,
तेरे भोग की परिभाषा में,
मैं चेतना हूँ, जो गूँज रही है
इतिहास की हर भाषा में।
मानव हूँ मैं, कोई दृश्य नहीं तेरी वासना के रंगमंच का,
मैं शक्ति का प्रतिरूप हूँ, जो खड़ी है चरम अभिलाषा में।

तफ़रीक़-ए-आदमियत क्या,
मैं तो रूह की तजल्ली हूँ,
कोई शय नहीं बाज़ार की,
मैं खुद में एक मुकम्मल नबी की आयत हूँ।
मिटा दे जो मेरी ज़ात को,
वो ख़ाक अभी बनी नहीं,
मैं औरत हूँ, इस काएनात की सबसे बुलंद रिवायत हूँ।

मेरी ज़ात को महज़ इक जिस्म का उनवान मत देना,
मैं इंसान हूँ, मुझे अपनी हवस का सामान मत देना।
ख़लक़ किया है ख़ुदा ने मुझे अपनी सिफ़त के वास्ते,
मुझे अपनी बदाक़ली से तौहीन-ए-इंसान मत देना।

शिकस्त-ए-ज़हन है समझे,
वो जो इंसान न समझे मुझे,
वो ख़ाक ख़ुदा समझे।
मैं ज़मीन की ज़ीनत भी हूँ,
और फलक का जलाल भी,
कोई कह दे इस ज़माने से,
कि मुझे सिर्फ़ इंसान समझे!

- ललित दाधीच




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