ज़मीं पर चाँद भी आए तो भी लोग उदास रहते हैं,
खुद की कमी को आसमान कहते हैं,
शौहरत के कदम रखने पर आसमान को क्या फर्क,
एक पैर बढ़ाया है तो दूसरा कदम भी बढ़ाने पड़ते हैं,
शुरू होकर रास्ते चलकर दूरी के बाद ठहरने के ठिकाने लगते हैं,
अपनी खुदी को बुलंद करने में कितने बहाने लगते हैं,
खुद को पाक दिल औरों में खोट दिखाने में लगते हैं,
अधूरे लोग अपनी जगह पर पूरी दुनियां दिखाने में लगते हैं,
कितनी रज़ा रंजिश है इस जिंदगी में,
खुद के लिए सहज होने में कितने जमाने लगते हैं,
तेरी गलती बताने में 'ललित' अपने पराए भी दूरियां बढ़ाने में लगते हैं,
सोच नहीं सकते 'ललित' खुद के ही होने को खुद को प्रयोग जैसे आजमाने लगते हैं।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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