रामकथा का सार
भावांजलि श्रीराम के चरणों में
वन को चले रघुनाथ जी, त्याग महल सुखधाम।
धर्म निभाने के लिए, छोड़ा राज-विराम॥
स्वर्ण-मृग की माया में, हुआ अनर्थ अपार।
सीता-हरण, जटायु-बलि, राम हुए लाचार॥
शबरी के बेरों में, प्रेम-सुधा रसधार।
भक्त-प्रेम से रीझकर, हरि ने दिया दुलार॥
सुग्रीव से मैत्री हुई, बाली का संहार।
मित्र-धर्म और न्याय का, जग में हुआ प्रचार॥
सागर लाँघे हनुमता, पहुँचे माँ के पास।
राम-दूत ने दे दिया, विजय-प्रेम विश्वास॥
लंका में जब आग लगी, टूटा मद-अभिमान।
रावण-कुंभकर्ण गिरे, जीता धर्म महान॥
सेतु बना विश्वास का, सागर ने दी राह।
राम-नाम के बल मिटे, संकट और अथाह॥
अवधपुरी में लौटकर, राम बने सिरमौर।
दीप जले, मंगल हुआ, खुशियाँ चहुँ ओर॥
रामकथा का सार है, प्रेम, धर्म, सद्भाव।
राम बसें हर श्वास में, निर्मल हो मन-भाव॥
सीता जैसी शुचिता, लक्ष्मण जैसा त्याग।
हनुमत जैसी भक्ति से, मिटे हृदय का राग॥
राम नाम आधार हो, राम नाम विश्वास।
राममय हो जीवन सदा, राम रहें हर श्वास॥
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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