सपने बूंदें हैं बादल की,
जो कभी अपनी रहती नहीं ,
हक़ीकत है सागर का खारापन ,
याद आती है नींदों में उन पलकों की,
जो झपकी हमारे चेहरे को देखके कभी,
नाता है ये मेहमानों का जिनका जिक्र नहीं,
वो अपने वो पराये वो अमीरी वो ग़रीबी रही,
जो हासिल हुई पर कहीं इनकी इज़्ज़त नहीं,
ऐसा महसूस होता है कि ये सबकुछ खाली ही है,
पर भरता है वो खाली ही है,
तेरा मेरा असर बातों में फंस जाता है,
सबकुछ होते ही ही कुछ ना कुछ रह जाता है।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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