राजनीति अब संसदों तक सीमित नहीं रही,
चौपालों की धूल में भी इसकी आहट गहरी रही।
हर गली में चर्चा है, हर मन में सवाल,
किसके हिस्से क्या आया—क्यों बदहाल है हाल?
कभी विचारों की धरती थी, अब नारों का शोर,
सच पीछे छूट रहा, आगे बढ़ता जोर।
वादों की बरसात हुई, भाषण हुए हजार,
जनता फिर भी पूछ रही—कब बदलेगा संसार?
कुर्सी की खातिर रिश्तों का मोल बदल जाता है,
मौसम बदले तो नेता का बोल बदल जाता है।
कल तक जिन पर आरोप थे, आज वही सम्मान,
सत्ता के गलियारों में कैसा यह विधान?
जब राजनीति नीति से हटकर गणना बन जाती है,
जनता की पीड़ा अक्सर चर्चा से कट जाती है।
लोकतंत्र के माथे पर तब चिंता की रेखा है,
क्योंकि सत्ता के आगे जनमत कितना देखा है?
खेतों में पसीना है, आँखों में आस,
मंडी तक पहुँचते-पहुँचते बदल जाता है भाव।
कर्ज़, लागत, मौसम—तीनों उसके साथ,
अन्न उगाने वाले की क्यों कठिन हुई राह?
मजदूर के हाथों में श्रम की पहचान,
फिर भी अधूरी रहती उसके घर की थाली-जान।
शहर खड़े हुए जिन हाथों की मेहनत से,
उन हाथों का घर क्यों दूर है राहत से?
युवा डिग्रियाँ लेकर चौराहे पर खड़ा,
आँखों में भविष्य, मगर रास्ता पड़ा पड़ा।
परीक्षा की तारीखें, परिणाम का इंतजार,
उम्र निकलती जाती—कब मिलेगा रोजगार?
शिक्षा ज्ञान बने, केवल व्यापार नहीं,
बच्चे की प्रतिभा धन की मोहताज नहीं।
अस्पताल में जीवन का मूल्य समान रहे,
गरीब की बीमारी उसकी पहचान न बने।
धरती के घावों पर विकास के गीत हैं,
जंगल कम होते जाएँ, ऐसे भी रीत हैं।
नदी की साँस घुटे और शहर बढ़ते जाएँ,
तो आने वाली पीढ़ी से क्या उत्तर पाएँ?
धर्म मनुष्य को जोड़े, इतना ध्यान रहे,
आस्था के नाम पर कोई इंसान न बाँटा जाए।
जाति की दीवारों से कब तक होगा फैसला,
कब नागरिक पहले होगा, फिर कोई सिलसिला?
नारी की सुरक्षा भाषणों का विषय न हो,
उसकी स्वतंत्रता केवल उत्सव का श्लोक न हो।
जिस बेटी को कहते हो भारत का अभिमान,
उसके भय को समझना भी होगा सम्मान।
प्रश्न लोकतंत्र की साँस हैं—प्रश्नों से मत डरना,
सत्ता कोई भी हो, सच कहने से मत मुकरना।
असहमति देशद्रोह नहीं, लोकतंत्र की शान,
संवाद बचा रहे तो बचता है संविधान।
पर दोष केवल सत्ता का कहना भी आसान है,
जनता के निर्णय में भी उसका योगदान है।
मत यदि जाति, लालच या भय में ढल जाएगा,
तो गलत चयन का भार कौन उठाएगा?
चेहरा नहीं, चरित्र देखो; भाषण नहीं, काम,
वादे नहीं, बीते वर्षों का लो हिसाब तमाम।
जो बाँटे, उससे सावधान; जो जोड़े, उसका साथ,
लोकतंत्र विवेक माँगता है—केवल उँगली का निशान नहीं हाथ।
राजनीति से भागना कोई समाधान नहीं,
हर अन्याय पर चुप रहना सम्मान नहीं।
जाग्रत नागरिक ही व्यवस्था बदल पाता है,
सवालों का साहस ही लोकतंत्र बचाता है।
न कुर्सी बुरी, न सत्ता अपने आप बुरी,
बुरी वह नीयत जो हो जनहित से अधूरी।
राजनीति तब सार्थक, जब सेवा उसका धर्म,
वरना सत्ता का वैभव केवल बन जाता भ्रम।
नेता वह नहीं जो केवल मंच सजाए,
नेता वह जो संकट में जनता के पास आए।
जिसके लिए पद साधन हो, साध्य न सम्मान,
जिसकी नीति में दिखे अंतिम जन का मान।
संसद में उठे सवालों की सच्ची आवाज़,
सड़क का प्रश्न पहुँचे सदन तक बेआवाज़।
शासन का अर्थ केवल आदेश न रहे,
हर नागरिक के अधिकारों का परिवेश रहे।
फिर किसान की आँखों में मौसम से आगे सपना होगा,
युवा के हाथ में केवल प्रमाणपत्र नहीं—काम होगा।
मजदूर की मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा,
बेटी को भय नहीं, अपने पंखों का आकाश मिलेगा।
तब राजनीति फिर सेवा का पर्याय बनेगी,
जनता और शासन के बीच विश्वास खिलेगा।
नफरत की जगह संवाद का दीप जलेगा,
लोकतंत्र अपने अर्थ में फिर से ढलेगा।
लेकिन यह बदलाव केवल भाषण से नहीं आएगा,
हर नागरिक अपना दायित्व निभाएगा।
न अंध समर्थन होगा, न अंध विरोध की चाल,
सत्य, विवेक और कर्म होंगे अपना ढाल।
क्योंकि देश किसी दल, किसी सत्ता का नाम नहीं,
भारत केवल चुनावी मौसम का मुकाम नहीं।
यह खेतों की हरियाली, श्रमिक का सम्मान,
सीमा का प्रहरी और माँ की मुस्कान।
इसलिए राजनीति को नीति से जुड़ा रहने दो,
सत्ता को जनता के प्रति उत्तरदायी रहने दो।
विचार अलग हों, फिर भी संवाद बना रहे,
भारत सबसे ऊपर—यह विश्वास बना रहे।
राजनीति रहे—पर जननीति के साथ,
सत्ता रहे—पर जनसेवा के साथ।
विचार रहें—पर संवाद के साथ,
भारत रहे—तो हर भारतीय के विश्वास के साथ।
यही समय की पुकार, यही मन की आवाज़—
जागे नागरिक, जागे लोकतंत्र का राज।
सच की मशाल लेकर इतना काम करें—
देश को भाषणों से नहीं,
अपने कर्मों से बेहतर नाम करें।
— आदित्य शेखर ‘अनुगूँज’


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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