अपनी स्नेहाशीष की
अतुल्य भंडार के मध्य
गहरी काली सिंहासन पर
विराजमान, साम्राज्ञी ' निशा '
लुटाती है,हम पर, दोनों हाथों से
स्नेह - धन की कोमलता
जब, हमें ढंक देती है,
अपनी स्नेहांचल की माधुर्य से,
तब,हम,बंद आंखों से
सैर करते हैं,एक, अलौकिक
दुनिया के अद्भुत गलियों में
'निशा' अपनी वात्सल्य- जल से
सींचित कर देती है, हमारी
सिहरे - थके -तन-पौधे को,
अपनी कोमल हथेलियों से
सहला सहला कर,
पुनर्जीवित सी कर देती है
हमारी मृतप्राय -सी, कोशिकाओं को
हमें, नखशीश पुनरूर्जित -सी कर
सौंप देती है,'उषा' को,
यह कहते हुए कि, मैंने अपनी
जिम्मेदारी निभा ली,अब,
लो, सम्हालो,
इस मानव मन को।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







