वक़्त का सुनहरा आफ़ताब, सियाह हो गया..
रौशनी के हाथों, ये कैसा गुनाह हो गया..।
कौन पूछेगा उम्र-ए-सबक, रोज़-ए-हश्र के दिन..
खयालों ने साथ न दिया, ज़माना गुमराह हो गया..।
इस बाज़ार ए दिल में, नीलामियों की दरकार बहुत..
कभी शाह हुआ आदमी, कभी आदमी तनख़्वाह हो गया..।
इस शहर के मुलज़िम है, महफूज़ दीवारों के उस तरफ़..
वकील ओ मुंसिफ वही, और वही गवाह हो गया..।
उम्र बसर की या कि, खुद-ब-खुद हो गई शायद..
कभी गिरा कभी संभला, और तवाज़ुन से निबाह हो गया..।
पवन कुमार क्षितिज


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







