हम बस खाना बनाते हैं,
पर हर दाने में दुआ रखते हैं,
हर खुशबू में एक चाहत,
हर थाली में संसार रखते हैं।
सुबह की नींद अधूरी छोड़,
पहली लौ को प्राण बनाते हैं,
लोग कहते हैं — ‘बस इतना?’
हम उसमें जीवन रचते हैं।
त्योहारों की रौनक में हम,
आटे में मिठास मिलाते हैं,
थकान को तवे पर रख,
मुस्कान का रोटी बनाते हैं।
बीमार हों तो क्या होगा,
दवा से पहले चूल्हा जलाते हैं,
और लौटकर भी सबसे पहले,
घर की भूख मिटाते हैं।
हम बस खाना बनाते हैं —
पर सच्चाई यह भी तो है,
यमराज भी जब आएंगे,
हम रोटी पर घी लगाते होंगे।
हम बस खाना बनाते हैं —
पर यही “बस”
घर को घर बनाता है।
हर निवाले में प्रेम का स्वाद,
हर खुशबू में जीवन बसता है।
हम तो क्या ही करते है ?
“हम बस खाना बनाते हैं”।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







