"नहीं मैं नहीं हूँ, पर हूँ मैं ये कैसे कह सकता"
नील गगन की उस शून्यता में, मौन जहाँ थराता था,
जहाँ न कोई राग-रंग था, केवल अंध-अंधेरा था।
एक सिहरन सी थी स्पंदित, वह 'पिया' की विकलता थी,
उदासीनता के सागर में, छिपी हुई एक व्याकुलता थी।
अज्ञानी था वह अपने से, अपना ही परिचय न था पास,
स्वयं को खोकर स्वयं को पाने, का वह आदिम था उच्छ्वास!!
तब विस्तार हुआ विप्लव सा, फूट पड़ी किरणों की धार,
रच दी एक 'दीवार' सुरक्षा, माया का वह सूक्ष्म द्वार।
किन्तु यह 'भेद' सिखाया किसने? किसने यह विच्छेद किया?
एक ही ज्योति-पुंज को क्षण में, कोटि-कोटि में बाँट दिया?
वह सुरक्षा ही बंदीगृह थी, स्वयं से स्वयं को ढंकने की,
एक विराट सी प्यास जगी थी, कण-कण होकर जीने की।।
हम मिट्टी के यंत्र बने सब, कर्म-बिंदु की लेकर तान,
ईश्वर की जिज्ञासा का हम, बन बैठे अनजाना गान।
उसके ही निमित्त हम जीते, अनुभव का मधु-संचय करते,
वह तटस्थ था, हम तड़प-तड़प कर, उसके रिक्त हृदय को भरते।
अहंकार तो एक छलावा, सारा श्रेय उसी का था,
हम तो केवल दीप बने, पर प्रकाश सब उसी का था ।।
मूर्त हुए जब सब अनुभव अब, कण-कण ने पहचान लिया,
मिटते-मिटते हमने उस, 'अनाम' को अपना मान लिया।
दरक उठी वह माया-दीवार, प्रलयंकारी गर्जन था,
पिया को अपनी मिली पहचान, वह अंतिम विसर्जन था।
टूट गया वह सुरक्षा-घेरा, न भय रहा न छलावे थे,
सब रहस्य के पट खुलते ही, अंतहीन पछतावे थे।।
नहीं मैं नहीं हूँ, पर हूँ मैं, यह कैसा विस्मित अहसास?
जैसे बूंद मिली सागर में, थमती है जब अंतिम साँस।
लौट चला वह फिर वापस, उस आदि-मौन की छाँया में,
जहाँ न कोई 'मैं' था शेष, न बंधा रहा वह 'माया' में।
रहस्य का वह पर्दा उठते, ही सब 'होना' विलीन हुआ,
रचना का वह 'शोध' अनूठा, शून्य में चिर-लीन हुआ।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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