Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

मुस्कान का यज्ञ

मुस्कान...
सिर्फ होंठों पर ठहर जाने वाली
एक छोटी-सी रेखा नहीं है,
यह तो भीतर जलते
एक ऐसे यज्ञ की लौ है,
जिसकी हर आहुति के बाद
मन थोड़ा और उजला होता है।

कितनी अजीब बात है—
हम दुखों को गिनते रहते हैं,
पर मुस्कुराने के कारण
गिनना भूल जाते हैं।

कभी किसी ने
बिना कुछ पूछे मुस्कुराकर देखा है आपको?

उस एक मुस्कान में
कितनी बातें होती हैं—
“मैं हूँ...”
“तुम अकेले नहीं हो...”
“सब ठीक हो जाएगा...”

और शायद इसी लिए
मुस्कान बाँटने से घटती नहीं,
बल्कि बढ़ती जाती है।

एक मुस्कान
थके हुए मन को ऊर्जा देती है,
झुकी हुई आँखों में
आत्मविश्वास लौटा देती है,
और निराशा के अँधेरे में
सकारात्मकता का
एक छोटा-सा दीप जला देती है।

कभी-कभी
हम किसी के जीवन की समस्या
हल नहीं कर सकते,
उसका दर्द भी
अपने हिस्से नहीं ले सकते,
लेकिन...

हम उसके पास बैठ सकते हैं,
उसका हाथ थाम सकते हैं,
और मुस्कुराकर कह सकते हैं—
“चलो, एक बार फिर कोशिश करते हैं।”

शायद यही
मानव होने की सबसे सुंदर बात है।

मुस्कान का अर्थ
यह नहीं कि जीवन में दर्द नहीं है।

कभी-कभी तो
सबसे सच्ची मुस्कान वही होती है
जो आँसुओं के बहुत पास से
होकर आती है।

जिस चेहरे ने
बहुत कुछ सहा हो,
और फिर भी
दूसरों के लिए मुस्कुरा सके—
उस मुस्कान में
सिर्फ खुशी नहीं,
एक पूरा जीवन बोलता है।

इसलिए...

जब जीवन
आपके सामने कठिन प्रश्न रखे,
तो हर उत्तर तुरंत मत खोजिए।

कभी बस मुस्कुरा दीजिए।

क्योंकि मुस्कान
समस्या को मिटाती नहीं,
लेकिन हमें
उससे लड़ने की ताकत देती है।

हर दिन
अपने भीतर एक छोटा-सा यज्ञ जलाइए,
अपनी चिंता की एक आहुति दीजिए,
अपने भय की एक आहुति दीजिए,
अपने अहंकार की एक आहुति दीजिए...

और अंत में
एक मुस्कान रख दीजिए।

फिर देखिए—
राख से भी
उम्मीद जन्म लेती है।

मुस्कुराइए...
क्योंकि आपकी मुस्कान
शायद आपके लिए सिर्फ एक पल हो,
लेकिन किसी और के लिए
पूरे दिन की रोशनी बन सकती है।

और जीवन में
इससे बड़ी आहुति क्या होगी—
कि हम अपने हिस्से की रोशनी
किसी और के अँधेरे में रख आएँ।

डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (1)

+

सरिता पाठक said

आप सही कहते हैँ सर जी एक मुस्कान दर्द को कम कर देती थे pr👌ज़ब दिल मे दर्द हो तो होठों पर मुस्कान आती नहीं है अति सुन्दर रचना आदरणीय सर जी को सादर प्रणाम 🙏हर पंक्ति ह्रदय स्पर्शी 👌👌

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