#एक संत ऐसे भी थे...
औलेंडा की मिट्टी में आज भी जीवित है संत लटुरिया वाले बाबा की कहानी...
रामभक्ति, बादशाह अकबर से जुड़ी लोककथा, समाधि, दो शाखाओं वाला नीम और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएँ
आगरा। फतेहपुर सीकरी का नाम आते ही अकबर, बुलंद दरवाजा और मुगलकालीन इतिहास की तस्वीर आँखों के सामने उभर आती है। लेकिन इसी ऐतिहासिक क्षेत्र की मिट्टी में कई ऐसी लोकस्मृतियाँ भी छिपी हैं, जिनका उल्लेख इतिहास की बड़ी पुस्तकों में भले न मिले, लेकिन वे स्थानीय परिवारों और गाँवों की स्मृतियों में आज भी जीवित हैं। ऐसी ही एक अनकही कथा आगरा के फतेहपुर सीकरी क्षेत्र के औलेंडा गाँव से जुड़ी है।
यह कथा है श्री श्री 1008 श्री लटुरिया वाले बाबा की, जिन्हें परिवार की परंपरा में एक सिद्ध संत, रामभक्त और लोककल्याण की भावना से जीवन समर्पित करने वाले संत के रूप में याद किया जाता है।
बाबा से जुड़ी यह कथा लेखक डॉ. मयंकॆश कुमार दुबे के परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही मौखिक परंपरा का हिस्सा है। डॉ. दुबे स्वयं बाबा के बड़े भाई की वंशपरंपरा से जुड़े होने का उल्लेख करते हैं। उनका कहना है कि बाबा की कथा उनके लिए केवल किसी संत की कहानी नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों से मिली ऐसी विरासत है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना जरूरी है।
#बचपन से ही रामभक्ति में लीन थे बाबा!
पारिवारिक परंपरा के अनुसार, लटुरिया वाले बाबा दो भाइयों में छोटे थे। उनके बड़े भाई गृहस्थ जीवन में थे और सरल स्वभाव के थे। वे कुछ अस्वस्थ भी रहते थे। बाबा बचपन से ही भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन रहते थे। खेती-बाड़ी में वे अपने बड़े भाई की सहायता करते। खेत में हल चलाते, मेहनत करते, लेकिन उनके मुख पर हर समय रामनाम रहता। परिवार में आज भी बाबा के व्यक्तित्व का वर्णन एक ऐसे संत के रूप में किया जाता है, जिनका जीवन सादगी, भक्ति और साधना से जुड़ा था।
कहा जाता है कि बाबा सफेद वस्त्र धारण करते थे। उनकी सफेद दाढ़ी थी। एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में डंडा रहता था तथा मुख पर निरंतर रामनाम का जाप।
जब भगवान ने साधु बनकर ली बाबा की परीक्षा
बाबा की भक्ति से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पारिवारिक कथा भगवान द्वारा उनकी परीक्षा लेने की है।
कहा जाता है कि एक दिन बाबा खेत में हल चला रहे थे। उसी समय भगवान साधु का वेश धारण करके उनके पास आए और कहा कि उन्हें बहुत भूख लगी है तथा कुछ भोजन चाहिए।
बाबा ने विनम्रता से कहा कि इस समय उनके पास ऐसा कुछ नहीं है जिससे साधु की भूख मिटाई जा सके।
तब साधु ने सामने खड़ी एक छोटी-सी बछिया की ओर संकेत करते हुए कहा कि उससे दूध निकालकर ले आओ।
बाबा ने आश्चर्य से कहा कि यह तो अभी बहुत छोटी है, यह दूध कैसे देगी?
लेकिन साधु के कहने पर बाबा कमंडल लेकर बछिया के पास पहुँचे। परिवार में प्रचलित कथा के अनुसार, जब बाबा ने दूध निकालना शुरू किया तो वह नन्ही बछिया दूध देने लगी।
बाबा आश्चर्यचकित रह गए।
दूध लेकर वे साधु के पास लौटे तो साधु ने कहा कि अब इससे खीर बनाओ।
बाबा ने कहा कि उनके पास न चावल हैं और न चीनी।
लोककथा के अनुसार, साधु ने वहीं से मिट्टी की चुटकी उठाई और उसे चावल तथा चीनी के स्थान पर डालने को कहा। बाबा ने दूध गर्म किया और कथा के अनुसार खीर तैयार हो गई।
बाबा ने वह खीर साधु को प्रसाद के रूप में अर्पित की।
साधु उनसे अत्यंत प्रसन्न हुए और कहा कि वे बाबा की सेवा से प्रसन्न हैं, इसलिए वे अपनी इच्छा के अनुसार वरदान माँग सकते हैं।
बाबा ने अपने लिए न धन माँगा, न संपत्ति और न कोई सांसारिक सुख। पारिवारिक परंपरा के अनुसार उन्होंने लोककल्याण की भावना से प्रार्थना की कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भगवान का नाम लेकर उचित मनोकामना के साथ आए, उसका कल्याण हो और उसकी मनोकामना पूर्ण हो।
कथा के अनुसार इसके बाद साधु ने बाबा को अपने वास्तविक स्वरूप के दर्शन दिए और अंतर्ध्यान हो गए।
इसके बाद बाबा का पूरा जीवन भगवान की भक्ति, रामनाम, तपस्या और लोककल्याण को समर्पित हो गया।
#अकबर और लटुरिया वाले बाबा की लोककथा...!
बाबा से जुड़ी सबसे चर्चित कथा फतेहपुर सीकरी के बादशाह अकबर से संबंधित है।
परिवार में चली आ रही लोककथा के अनुसार, जब फतेहपुर सीकरी में निर्माण कार्य चल रहा था, तब निर्माण को लेकर एक विचित्र समस्या सामने आ रही थी। दिनभर कारीगर मेहनत करके निर्माण करते और रात में बना हुआ हिस्सा गिर जाता। बार-बार निर्माण कराया गया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।
कथा के अनुसार, उस समय लोगों में यह धारणा बनने लगी कि किसी अदृश्य शक्ति के कारण निर्माण कार्य टिक नहीं पा रहा है।
इसी दौरान अकबर को लटुरिया वाले बाबा की ख्याति के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने बाबा को अपने पास बुलाने के लिए सैनिकों को हाथी-घोड़ों के साथ भेजा।
सैनिक बाबा के पास पहुँचे और बादशाह का संदेश सुनाया।
बाबा ने कहा—
“आप जाइए, मैं आ जाऊँगा।”
सैनिकों ने उनसे साथ चलने का आग्रह किया और घोड़े पर बैठने को कहा, लेकिन बाबा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
कहा जाता है कि बाबा जीवों पर सवारी नहीं करते थे।
उन्होंने सैनिकों से कहा कि वे जाएँ, वे स्वयं वहाँ पहुँचेंगे।
लोककथा के अनुसार, जब सैनिक फतेहपुर सीकरी पहुँचे तो बाबा उनसे पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे।
सैनिक यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
अकबर ने ली बाबा की परीक्षा
पारिवारिक कथा के अनुसार, अकबर बाबा की आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान की परीक्षा लेना चाहते थे।
उन्होंने एक गड्ढा खुदवाकर उसमें एक गर्भवती बकरी को छिपा दिया। उसके ऊपर एक सुंदर आसन बनवाया गया और उस पर मखमली गद्दे बिछाकर उसे राजसी सिंहासन जैसा रूप दे दिया गया।
जब बाबा वहाँ पहुँचे तो अकबर ने उनसे उस आसन पर बैठने का आग्रह किया।
बाबा मुस्कुराए और कहा—
“बादशाह! यदि मैं जीवों पर बैठता तो आपके सैनिकों के साथ घोड़े पर बैठकर ही आ जाता।”
इसके बाद बाबा ने कहा कि उस आसन के नीचे तीन जीव हैं।
अकबर यह सुनकर चौंक गए।
उन्होंने तो केवल एक गर्भवती बकरी को वहाँ छिपाया था।
बाबा ने कहा कि एक बकरी है और उसके गर्भ में दो बच्चे हैं।
कथा के अनुसार आसन हटाया गया तो वहाँ गर्भवती बकरी मिली।
इस घटना से अकबर अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने बाबा से क्षमा माँगी।
इसके बाद उन्होंने अपनी समस्या बाबा को बताई।
तीन कंकड़ और निर्माण की लोकमान्यता
पारिवारिक परंपरा के अनुसार, बाबा ने निर्माण स्थल को देखा और वहाँ तीन कंकड़ फेंके।
उन्होंने अकबर से कहा कि अब निर्माण कार्य शुरू कराया जाए।
कथा के अनुसार इसके बाद निर्माण कार्य पूरा हुआ और पहले जैसी बाधा नहीं आई।
परिवार में यह भी कहा जाता है कि बाबा के सम्मान में बुलंद दरवाजे की पहली तीन सीढ़ियों पर उनका नाम अंकित कराया गया था।
हालाँकि इस दावे का स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। इसलिए परिवार इस प्रसंग को बाबा से जुड़ी अपनी लोकस्मृति और परंपरा के रूप में सुरक्षित रखता है।
औलेंडा की धरती पर बाबा की साधना
पारिवारिक मान्यता के अनुसार, बादशाह अकबर ने बाबा को औलेंडा क्षेत्र में नदी के किनारे लगभग साढ़े सात सौ बीघा भूमि प्रदान की थी।
यहीं बाबा ने अपना जीवन भजन, रामनाम, पूजा और साधना में व्यतीत किया।
आज भी औलेंडा गाँव में बाबा की समाधि उनकी स्मृति और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र मानी जाती है।
बाबा भगवान श्रीराम के साथ-साथ हनुमानजी की भी भक्ति करते थे। परिवार की परंपरा के अनुसार, औलेंडा के पुट्टा थोक में बालाजी महाराज के छोटे मंदिर के पास बाबा की समाधि स्थित है।
स्थानीय आस्था में इस स्थान से अनेक मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं।
बाबा के स्नान से जुड़ी अद्भुत कथा
बाबा के जीवन से जुड़ी एक अन्य लोककथा उनके स्नान से संबंधित है।
कहा जाता है कि बाबा कुएँ पर स्नान करते थे। स्नान के समय वे अपनी धोती को आकाश की ओर उछाल देते थे और वह धोती मानो हवा में ऊपर चली जाती थी।
अगले दिन बाबा हाथ ऊपर करते और वही सूखी धोती उनके हाथ में आ जाती।
परिवार में इसे बाबा की साधना और सिद्धि से जुड़ा एक चमत्कारिक प्रसंग माना जाता है।
समाधि और दो भाइयों वाला नीम
बाबा की कथा का सबसे भावनात्मक प्रसंग उनकी समाधि से जुड़ा है।
परिवार की मान्यता के अनुसार, बाबा ने अपने अंतिम समय में जीवित समाधि ली।
जिस स्थान पर उन्होंने समाधि ली, वहाँ बाद में एक नीम का वृक्ष स्वतः उत्पन्न हुआ।
इस नीम की दो प्रमुख शाखाएँ इस प्रकार विकसित हुईं कि वे देखने में मानो दो भाई एक-दूसरे को गले लगा रहे हों।
दुबे परिवार में इन दोनों शाखाओं को बाबा और उनके बड़े भाई के प्रेम और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है।
यह नीम का वृक्ष आज भी परिवार की आस्था में विशेष स्थान रखता है।
आज भी निभाई जाती हैं कई परंपराएँ
बाबा की स्मृति से जुड़ी कई पारिवारिक परंपराएँ आज भी जीवित हैं।
दुबे परिवार में नीम की लकड़ी को जलाना वर्जित माना जाता है। नीम की लकड़ी से फर्नीचर बनाना भी परिवार की परंपरा में निषिद्ध है।
समाधि स्थल के चौतरे से जुड़ी भी एक पुरानी मान्यता है कि गाँव की बहुएँ उस चौतरे पर नहीं चढ़तीं, जबकि बेटियाँ वहाँ जा सकती हैं।
इसी तरह बाबा के वंशज परिवार में बकरी पालने की परंपरा नहीं है और बकरी के प्रवेश को लेकर भी एक पुराना पारिवारिक निषेध माना जाता है।
इन परंपराओं को किसी कानूनी या वैज्ञानिक नियम के रूप में नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक आस्था और सांस्कृतिक स्मृति के रूप में देखा जाता है।
बाबा की कथा को दुनिया तक पहुँचाने का प्रयास
डॉ. मयंकॆश कुमार दुबे का कहना है कि बाबा की कथा उनके परिवार में लंबे समय से मौखिक रूप में जीवित है, लेकिन लिखित रूप में इसे सुरक्षित करने का प्रयास बहुत कम हुआ।
उनका मानना है कि किसी गाँव की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमा से नहीं होती। उसकी पहचान उसके इतिहास, लोककथाओं, संतों, परंपराओं और पूर्वजों की स्मृतियों से भी होती है।
“मैं चाहता हूँ कि मेरे गाँव औलेंडा और हमारे पूर्वज श्री श्री 1008 श्री लटुरिया वाले बाबा की यह कथा आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचे। यह केवल हमारे परिवार की कहानी नहीं, बल्कि हमारी लोकस्मृति और सांस्कृतिक विरासत है।”
फतेहपुर सीकरी का इतिहास दुनिया जानती है। लेकिन उसके आसपास के गाँवों की मिट्टी में छिपी अनेक लोककथाएँ आज भी लोगों तक पहुँचने की प्रतीक्षा कर रही हैं।
लटुरिया वाले बाबा की कथा भी ऐसी ही एक कहानी है—जिसमें रामभक्ति है, त्याग है, लोककल्याण की भावना है, आस्था है और एक परिवार की अपने पूर्वजों के प्रति गहरी श्रद्धा है।
शायद यही कारण है कि आज भी औलेंडा की मिट्टी में बाबा का नाम श्रद्धा से लिया जाता है।
और समाधि स्थल पर खड़ा वह दो शाखाओं वाला नीम मानो आज भी आने वाली पीढ़ियों से कह रहा है—
“विरासत केवल जमीन और मकान नहीं होती,
विरासत वह कहानी भी होती है
जिसे एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती है।”
श्री श्री 1008 श्री लटुरिया वाले बाबा को सादर नमन।
लेखक — डॉ. मयंकॆश कुमार दुबे(शिक्षक एवं लेखक)
श्री श्री 1008 श्री लटुरिया वाले बाबा की वंशपरंपरा से संबद्ध..
औलेंडा, आगरा (उ.प्र.) ,8630291252
संपादकीय टिप्पणी: लेख में वर्णित चमत्कारिक एवं अकबर से जुड़े प्रसंग लेखक के परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपरा और लोकस्मृति पर आधारित हैं। इन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।


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