सवाल यह नहीं कि अस्तित्व क्यों है,
जवाब में न्याय नहीं पर मुझे संकोच नहीं।
लेखक सही भाषाएँ लिखता है और,
मनुष्य कोशिश करता है कि शब्दों की परिपक्वता की रुबाई (या रूह) में वह कैसे स्वयं को ढूंढ पाए।
मनुष्य महज़ एक परीक्षण बनने की कोशिश है।
सीमाएं मौजूद रहती हैं ताकि मनुष्य उन्हें लांघ सके।
क्योंकि अच्छा मनुष्य बनने के लिए स्वयं पर विश्वास करना ही एकमात्र कर्म है।
यह संसार अंततः सही राह पर झुक जाता है
ताकि मनुष्य पूर्णता को प्राप्त कर सके।
उम्मीद ही मनुष्य है, जो मृत्यु को रचते हुए एक जीवन बनाने की कोशिश करता है।
जीवन महज़ एक उत्पाद (प्रोडक्ट) बनकर रह गया है, लेकिन मनुष्य फिर भी कर्म करने की कोशिश में जुटा है; जीवन ऊपर-नीचे की पायदानों (चढ़ाव-उतार) पर बैठता है, इसलिए अंततः मृत्यु आकर सारे भ्रमों और बंधनों के दरवाज़े तोड़ देती है।
मुझे पूरी कहानी सुना दी गई (या मैंने जान ली),
लेकिन मैं फिर भी चक्रों (भूलभुलैया) में खो गया हूँ।
यदि मैं (स्वयं) ही 'क्यों' बन जाऊँ,
तो यह जीवन पूर्ण हो जाए।
मानवीय दृष्टिकोण हर चीज़ को केवल (अपने) एक पहलू से देखता है, फिर हम क्यों न्याय (भेदभाव) करते हैं; जबकि सब कुछ बस अपने अस्तित्व में मौजूद है, यहाँ कोई भी दो वजूद एक जैसे नहीं हैं।
मैं केवल एक 'संदेह' के रूप में जीवित हूँ,
मेरा कोई (स्थाई) वजूद नहीं है।
समस्त चराचर (सृष्टि) आनंद की रचना करता है, लेकिन मनुष्य (उसका) श्रेय खुद लेता है; मैं अपनी अंतिम मृत्यु का भी बलिदान करता हूँ
यदि पास से देखोगे (ज़ूम करोगे) तो मैं केवल 'अस्तित्व' (होना) मात्र हूँ, यदि दूरी बनाओगे तो वह एक कहानी बन जाती है।
यदि मेरा होना (अस्तित्व) तय है, तो मैं स्वयं को ही जानने की कोशिश करूँगा।
यदि मुझे देखना ही है, तो (मेरे भीतर) उसे देखो जो 'मैं' नहीं हूँ।
मैं स्वयं को ही एक 'संदेह' के रूप में (अपने केंद्र पर) केंद्रित करता हूँ।
मैं जान चुका हूँ कि स्वयं (आत्मा) कौन है, इसलिए अब सवाल महज़ परछाइयाँ हैं और जवाब केवल संदेह; लेकिन मैं फिर भी इस 'होने के कर्म' (अस्तित्व की लीला) में अडिग हूँ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







