हम बैठे रहते हैं घर में
मन का पंछी उड़
घूम आता है खुले गगन में
इसको रोक पाना
नहीं किसी के बस में
बंदिशों की इसे परवाह कहाँ
इसे रोक सके ऐसी चट्टान कहाँ
मन तो एक बहता दरिया है
इसे रोक पाना
हमारे बस की बात कहाँ
एक बार जो निकले
ये दुनिया की सैर पर
जमीं आसमान को आ जाता है
आंखों में कैद कर
कितना भी कोशिश करो
राहों में इसे बहलाने की
हर तरकीब नाकाम हो जाती है
इसे ठहराने की
ठहरना इसे मंज़ूर कहाँ
ना कोई शरहद इसे रोके
ना कोई दीवार
पल भर में कर लेता है
ये सारा जहां पार
हम बैठे रहते हैं अक्सर यूँ ही घर में
पर मन का पंछी उड़
घूम आता है खुले गगन में
इसकी उड़ान को रोक पाना
नहीं किसी के बस में
नित नए-नए सपने
मन में सजाता है
ख़्वाबों की नगरी में
अपना आशियाना बनाता है
निडर,निर्भीक मन
चंचलता का लिबास पहन
खुले आसमान में
घूमकर आ जाता है
ना रुकना इसे आता है
ना थकना इसे आता है
आज़ाद पंछी की तरह
स्वतंत्रता से उड़ना इसे आता है।।
-ममता तिवारी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







