""युद्ध जीते गए,
हार गए हम,
खून बहा,
मिला क्या,
सजा के सफ़र से,
घर उजाड़े गए,
मिला क्या,
सबको देखें,
होश तो है,
मेहनत की,
बसेरा हुआ,
वक्त जाया हुआ,
सबके सफ़र उजाड़े गए,
मिला क्या,
आज कहते हो कि कौन हैं हम,
चेहरे में गद्दारी छुपाने वाले,
मिला क्या,
बेहोशी के सब काम,
हर इंसान को करवा दिए,
उन्हें होश में रखकर,
एक दूसरे से वक्त ब वक्त मरवा दिए,
मिला क्या,
जिंदगी को बचाते ही,
ज़िंदा लोग कठघेरों में मार दिए,
मिला क्या,
कोई भी पूछें कैसे हो,
बता देना बर्बाद हैं हम,
जमाने में जिंदगी बचाने का काम है,
बाकी मिला क्या,
बस सता दिए गए हम,
इन ठेकेदारों को,
मिला क्या,
संस्कार, नियम और समाज में तो कोहरा है,
पीछे छिपा इंसान मिला क्या,
सबकुछ दांव उसी का है,
फिर वो इंसान दिखा क्या,
एक ही व्यक्ति से,
अरे! एक एक व्यक्ति से सबकुछ अपेक्षा रखते हो,
उसकी जिंदगी ही उपेक्षा में है,
मिला क्या,
जिंदगी खत्म क्योंकि यही बचाने में बिक गई,
इंसान खत्म क्योंकि अपने लिए तो कुछ नहीं कर सकता,
अस्तित्व खत्म क्योंकि हर पल साबित करने में ही गुज़रा और मिट गया,
सबको बर्बादी दिखाने वालों,
मिला क्या,
पत्थरों की रगड़ बात किससे करेगा,
फिर कहते हो तुम अजीब हो,
प्रेम नहीं है,
बहुत चुप हो।।""
- ललित दाधीच।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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