चेहरे ऊपर चढ़ा है चेहरा,
कहाँ भरोसा किससे आशा!
संगत-पंगत बिखर रहे अब
रिश्तों की बदली परिभाषा।
परिवर्तन के विकट दौर में,
व्याकुल मन की उलझन को
कहाँ छुपाऊँ, किसे बताऊँ?
प्रेम गीत मैं कैसे गाऊँ?
शान-शौकत की कमी नहीं है
खूब सजी है महल अटारी।
फिर भी मन में सूनापन है
हर शै अब तो यही बीमारी।
अपने दुख से आहत हैं सब
परहित की जब बात बिसारे,
कैसे उनमे प्यार जगाऊँ?
प्रेम गीत मैं कैसे गाऊँ?
अपनी सबकी डफली हो गई
सबका अपना राग हो गया।
नित शिष्टों के बोल बिगड़ते
मधुरता से वैराग्य हो गया।
यारी हो गई फूहड़ता की
गीत के मीठे बोलों से जब,
कैसे भटका सुर सजाऊँ?
प्रेम गीत मैं कैसे गाऊँ?
स्थिर हो अब रहे हिमालय,
बहे निर्मल हो यमुना गंगा।
वशीभूत नीज स्वार्थ के होकर
करें न हम कुदरत को नंगा।
सृष्टि की तस्वीर न बिगड़े
कभी विकास के नाम पर,
जन-जन को कैसे समझाऊँ?
प्रेम गीत मैं कैसे गाऊँ?
©️✍🏻 प्रमोद कुमार
गढ़वा (झारखण्ड)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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