मैं वृक्ष,धरा के कण कण को
अपनी जड़ जड़ में बांध रखा
मरुथल बनने से रोक रखा
जोड़ रखा और साध रखा
जल तांडव से मृदा मृदा को
रोका मैने क्षरण क्षरण से
बड़ी बड़ी नदियों के तट को
रखा बचाए जल भीषण से
जिस मिट्टी में पांव टिका है
मानव के स्वाभिमान का
क्यूं वो समझ नहीं पाता है
मेरे दिल के मान का
धरती को देकर हरियाली
आज भी डर डर जीता हूं
कौन सी डाली कब कट जाए
सोंच कर मर मर जीता हूं
देकर जीवनदायिनी सांसें
स्वयं घुट घुटकर रहता हूं
रक्षा करो! मेरी रक्षा करो!
करूण निवेदन करता हूं
सुन लो मेरी मौन चीख को
तड़प तड़प चिल्ला रहा हूं
सूख रहीं लाचार निगाहें
अपना दर्द सुना रहा हूं
ग्रीष्म ऋतु की अग्नि तपन से
तुम्हें बचाना काम है मेरा
बांध लो चाहे जैसे झूले
तुम्हें झूलाना काम है मेरा
मां की गोद सी शीतल छाया
देकर तुमसे कुछ नहीं मांगा
सुनकर पंछी प्रणय गीत भी
निष्ठुर मन तेरा नहीं जागा
वादा करता हूं,हे मानव!
तुम्हें मस्तियां दिया करूंगा
नहीं काटना हरी डालियां
खुशियां पीढ़ियों तक दिया करूंगा
जन्म जहां भी हुआ तुम्हारा
वो चारपाई में अंश है मेरा
घोड़े गाडियां खेल खिलौने
जितनी पाई है ,अंश है मेरा
घर के दर में और छप्पर में
लगाई तूने जो भी लकड़ियां
मेरी ही वंश को काट काट कर
जोड़ी ली अपनी जीवन कड़ियां
तेरे बूढ़ापे से मृत्यु तक मैं
पूरा पूरा साथ रहा
लेकिन मेरे वंश नाश में
तेरे वंश का हाथ रहा
जिस आंगन नन्हे बच्चों की
गूंज रही होती किलकारी
इंद्रियां स्वर्णिम आनंद से
भरी होती है भारी भारी
अपनी आंगन में,बाड़ी में
मेरा भी एक वंश उगा लो
और संग में करो मस्तियां
मुझे भी अपना बच्चा बना लो
पीढ़ियों से पीढ़ियों तक
खुशियों का वादा करता हूं
जब तक रहूं धरा पर जिंदा
तेरी भला का वादा करता हूं
जब तक रहूं धरा पर जिंदा
तेरी भला का वादा करता हूं।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







