मैं आजकल अपने आँसू के छींटे
किसी और आने नहीं देता…
आँसू में तो इतिहास पूरा गीला है,
फिर मेरे आँसू का क्या करोगे,
दर्द से गुजरने की बात थी,
पर गुजारा ही यहाँ होना था,
किसे कब क्या खबर थी…
आँसू छुपाते नहीं हो तुम,
बस अब किसी पर गिरने नहीं देते…
इतिहास भीगता है आँसुओं से,
पर आदमी…
अपने ही आँसुओं में डूब जाता है…
बात खत्म थी तो फिर करने से क्या होगा…
सिर्फ इतना बताओ कि छुपाना क्या है,
जो देखा जो नहीं देखा—
फिर बताना क्या है…
छुपाना वो नहीं जो तुम दुनिया से छुपाते हो…
छुपाना वो है…
जो तुम खुद से भी नहीं देखना चाहते…
जो दिख गया— कहानी है,
जो नहीं दिखा— वही जिंदगी है…
मैं खुद चेहरा देख रहा हूँ… या आईना
तुम ना चेहरा देख रहे हो…
ना आईना…
तुम अपना अक्स देख रहे हो…
आईना झूठा नहीं होता…
पर जो उसमें दिखता है—
वो पूरा तुम भी नहीं होते…
मैं उलझ गया…
अगर मैं देख रहा हूँ
तो किसे दिख रहा हूँ,
किसे देख रहा हूँ,
और कितना देख रहा हूँ…
जो देख रहा हूँ— वो हूँ,
या जो उस तरफ है…
और इस तरफ क्या है
जो वहाँ से दिखेगा…
और क्या नहीं है
जो यहाँ से वहाँ है…
पर फिर भी यही दिखेगा
तू खुद को देख रहा है…
और समझ रहा है कि कोई और है
जो सवाल तू पूछ रहा है…
उसका जवाब नहीं होता—
बस आदमी धीरे-धीरे
खुद ही सवाल बन जाता है।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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