मैं भी एक बेटा बनना चाहती हूँ।
हु तो मैं एक बेटा जैसा ही पर ,
अपनी माँ के आंख का नूर और अपने पापा की हम राज बनना चाहती हूँ।
वैसे तो पापा बेटा और बेटी में कोई फ़र्क नहीं करते पर जब बात पापा का हाथ बटाने का आता है तो वो ना जाने क्यों
ख़ुद को अकेला ही पाते हैं।
मैं अपने पापा की सर की बोझ नहीं उनकी सर की ताज बनना चाहती हूँ।
अपने परिवार की जान और मेरी माँ जिसपे फक्र कर सके वो इंसान बनना चाहती हूँ।
पापा बोलेंगे नहीं पर उनकी भी उम्र हो रही है, मैं अपने पापा और मां की उस ढलती उम्र का सहारा बनना चाहती हूँ और ये सब मै तब ही कर सकती हूं जब मैं अपने पापा की बेटी नहीं बेटा बन के आती क्यों कि समाज में तो बेटी का कुछ अपना नहीं होता है वो बस पराई ही होती है इसीलिये मैं एक बेटा बनना चाहती हूं।
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