भूल गए हैं हमको, वो लम्हे खुशबू वाले..
उजड़ गए हैं चमन, दिल की जुस्तजू वाले..।
ज़ुल्मत-ए-शब में, जो पा-ए-आफ़ताब मिला..
किस मुंसिफ से, फ़िर हक मांगे ये जुगनू वाले..
रात भर नींद के इंतज़ार में, शहर सड़कों पर घूमता है..
किस तरह अब आग बुझाएं, ये जलते पहलू वाले..।
ये तो ज़रा लब-ए-तबस्सुम का, हुनर आ गया हमको..
वरना बमुश्किल ज़ब्त किए हुए हैं हम, ज़ज़्बात आंसू वाले..।
अब दिल से कोई सुनता ही नहीं, दास्तां-ए- दिल..
क्या तभी इस कदर ख़ामोश है, ये महफ़िल-ए-गुफ़्तगू वाले..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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