हम जीत न पाए अपनों सें उसे नसीब का नाम दे दिया
कुछ दर्द बाक़ी था, उसे गैरों के जिम्मे वो काम दे दिया
हम चीखते रहे चिल्लाते रहे अश्क़-ए-ख़ूँ भी बहाते रहे
हालात ज़ालिम बना और ख़ुद क़ो नाम नाकाम दे दिया
दौर-ए-इश्क़ के रस्म-ए-उल्फ़त में तौहफा भी जरूरी हैं
फिर यूँ हुआ इस इश्क़ ने हमकों दर्द का इनाम दे दिया
ख़ता फ़क़त इतनी दिल-ए-नादान इश्क़ में बर्बाद हुआ
हमारे किरदार क़ो इन लोगो ने दाग़-ए-बदनाम दे दिया
क्या हासिल करते मक़ाम-ए-इश्क़ क़ो बताओ जानाँ
ग़म-ए-रोज़गार मसला था तुमनें दग़ा का नाम दे दिया
इश्क़ में कितने लुटे और कितना लुटना बाक़ी हैं कृष्णा
उसके आगे होश ऐसे लुटा ख़ुद क़ो उसे बेदाम दे दिया...
-कृष्णा शर्मा
अश्क़-ए-ख़ूँ = खून के आँसू , दौर-ए-इश्क़ = इश्क़ का दौर
दाग़-ए-बदनाम = बदनामी का दाग़, रस्म-ए-उल्फ़त = इश्क़ का दस्तूर


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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