कमबख़्त ज़िंदगी ने, लिया अचानक एक मोड़ ऐसा,
कि हमने बरसों की कमाई, अपनी इज़्ज़त गंवा दी।
आये थे जो कभी अपने बन, बेशुमार प्यार लुटाने हमें,
आज उन्हीं ने हमें, बड़ी भयानक सज़ा मुकर्रर कर दी।
मौजों में मौज करते थे, हम भी कभी सभी के चहेते थे,
आज ना मौज हैं ना हम खास हैं, क़िस्मत ने जो मात दी।
गलतफहमियों के शिकार हुए यहां सभी, बिना बात के,
छोड़ा अपनों ने साथ मेरा, तो ख़ुदा ने भी उँगली छोड़ दी।
बागों की तितलियाँ भी आकर सहानुभूति जताने लगी,
समझा जिसे अपना, हर उसने जीते जी आज मौत दी।
🖋️ रीना कुमारी प्रजापत 'मनस्वी'🖋️
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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