सनम तेरे दिल का, मिज़ाज़-ए-मौसम कैसा है..
ज़माने ने मेरे नाम से जो दिया, वो गम कैसा है..।
अब मिट चला है, तीर-ओ-खंज़र का निशाँ मग़र..
ज़ुबाँ से जो दिल पे बना, वो ज़ख़्म कैसा है..।
अब दौर-ए-फुरकत में भी, होती नहीं चश्म-ए-तर मेरी..
हम मुस्कुरा के सह लेते हैं, उनका ये सितम कैसा है..।
हमने तो बहुत इन्तेज़ार भी किया, मगर फिर भी..
वो ज़ख्म न भरा, जाने ये वक़्त-ए-मरहम कैसा है..।
जो मैने छोड़ा था, उसी चमन में है लौटना मुश्किल..
अब कोई तो बताए मुझे, वो गुल-ओ-शबनम कैसा है..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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